मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये

मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गयी मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त

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बहुत बेज़ार होती जा रही हूँ

बहुत बे-ज़ार होती जा रही हूँ मैं ख़ुद पर बार होती जा रही हूँ तुम्हें इक़रार के रस्ते पे ला कर मैं ख़ुद इंकार होती जा रही हूँ कहीं मैं हूँ सरापा

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जिसके गालों में टिप्पे पड़ते हैं

ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयाँ अपना बन गया रक़ीब आख़िर था जो राज़दाँ अपना (ग़ालिब) ‘ज़िक्र परीवश का-’ जिसके गालों में टिप्पे पड़ते हैं जिसके दाँतों में बर्क़ रखी है

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यह ज़्यादा बहुत ज़्यादा है

कुछ लोगों के पास हर चीज़ ज़रूरत से बहुत ज़्यादा है वे लोग ही जगह-जगह दिखते हैं बार-बार उनमें बार-बार दिखने की सामर्थ्य ज़्यादा है वे लोग दिन-रात बने रहते हैं अख़बारों

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जहाँ सुख है

जहाँ सुख है वहीं हम चटक कर टूट जाते हैं बारम्बार जहाँ दुख है वहाँ पर एक सुलगन पिघला कर हमें फिर जोड़ देती है।

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मैं सोचने लगता हूँ

तेज रफ्तार से दौड़ती बसें, बसों के पीछे भागते लोग, बच्चे सम्हालती औरतें, सड़कों पर इतनी धूल उड़ती है कि मुझे कुछ दिखाई नहीं देता । मैं सोचने लगता हूँ । पुरखे

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मेरे दुख की कोई दवा न करो

मेरे दुख की कोई दवा न करो मुझ को मुझ से अभी जुदा न करो नाख़ुदा को ख़ुदा कहा है तो फिर डूब जाओ, ख़ुदा ख़ुदा न करो ये सिखाया है दोस्ती

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काफ़्का के प्राहा में

एक उपस्थिति से कहीं ज़्यादा उपस्थित हो सकती है कभी-कभी उसकी अनुपस्थिति एक वर्तमान से ज़्यादा जानदार और शानदार हो सकता है उसका अतीत एक शहर की व्यस्त दैनन्दिनी से अधिक पठनीय

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मेडिकल व्यवसाय की ख़ौफ़नाक सच्चाईयाँ उजागर करता ‘ह्यूमन’

हॉटस्टार पर ह्यूमन सीरीज देखी जो भोपाल में फिल्माई गई हैं, भोपाल शहर को टीवी पर देखना अपने आप में रोचक है। पिछले दिनों इसी शहर को लेकर विसलब्लोअर सीरीज आई थी,

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