मेंटल

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हम सब लोग उसे पागल करार दे चुके थे। शक-शुबह की कहीं कोई गुंजाइश नहीं थी। इस किस्से से पहले वह हम लोगों की तरह ही नॉर्मल था। पिछले पन्द्रह सालों में कभी कोई अनोखा व्यवहार उसने नहीं किया था कि इन बदले हुए हालात में हम इसका उससे कोई सम्बन्ध जोड़ सकें। बल्कि इन तमाम पिछले सालों में वह हम सबसे अधिक नम्र, आज्ञाकारी और ड्यूटी का पाबंद रहा था। इसी कारण हममें से बहुतों ने कई बार कई तरह से उसके सीधेपन का फायदा भी उठाया होगा।

हम लोगों ने आपस में एक दूसरे से बातें करते हुए उसके दुर्भाग्य पर दुख प्रकट किया। आपस में ही एक दूसरे से उसके लिए हमदर्दी जताई क्योंकि अब हम लोग सहज ही उसे इस लायक नहीं समझ रहे थे कि सीधे उसी से उसकी बदकिस्मती पर हमदर्दी जताएँ। कुछ लोग, जो उसे ज्यादा करीब से जानते थे, उसके नादान बच्चों और बीमार घरवाली का हवाला देकर इस किस्से को भी गमगीन बना रहे थे।

अपने एक ऐसे साथी को, जिसे आज तक हम प्रेम और आदर की नजर से देखते आए थे, एकाएक ‘पागल’ कह देना अपनी गैर-जिम्मेवारी और उसकी बेइज्जती का एहसास देता हुआ-सा लगता था। इसीलिए शायद हम लोगों ने, जिनमें ज्यादातर बहुत कम पढ़े-लिखे लोग थे, एक नर्म-नर्म-सा शब्द पकड़ लिया था और सभी लोग अब उसके बारे में बात करते हुए उसके ‘मेन्टल’ हो जाने की ही बात करते थे। और इस शब्द को इस्तेमाल करते हुए हमें लगता था कि एक तीखे, धारदार शब्द की निस्बत इस गुदगुदे शब्द का इस्तेमाल करने से हम अपने साथी के सम्मान को चोट नहीं पहुंचा रहे हैं। कई दूसरी चीजों की तरह हमें यह शब्द भी सरकारी खजाने से मिला था और हम इसका खुलकर व्यवहार कर रहे थे।

अपने मन की गहराई में हम उसके मेन्टल हो जाने से कहीं ज्यादा बुरे इस जमाने में अपने साथी की नौकरी छूट जाने के कारण परेशान थे और उसके हालात में खुद अपने आपको रखकर और अपने बीवी-बच्चों के भविष्य की बात सोचकर सिहर उठते थे।

उसकी नौकरी जाने में अब कोई शक-शुबह नहीं था। हम सभी लोग जो अपने होश-हवाश में, दुरुस्त-दिमाग थे, यह अच्छी तरह समझ रहे थे।

यों, हमारी कम्पनी में, जहाँ किसी विधवा को अपने आदमी का बकाया पैसा तब तक नहीं मिलता जब तक आदमी खुद अपनी मौत की तसदीक न कर दे, इस मामले को लेकर खासी जल्दबाजी मची हुई थी। अफसर लोग इसे जल्दी से जल्दी निपटा देने के लिए उतावले थे। उसे डाक्टरी जाँच के लिए ‘मेन्टल स्पेशलिस्ट’ के पास भेज दिया गया था।

डाक्टर का फैसला जानने की हमें कोई उतावली नहीं थी क्योंकि एक तो मामला बिल्कुल साफ था और दूसरे जिस डाक्टर के पास उसे भेजा गया था उसकी ईमानदारी पर किसी को शक नहीं था, इसलिए कोई गुंजाइश भी नहीं थी। लेकिन इस सनकी डाक्टर की ईमानदारी को देखकर इस बार हमें सचमुच मलाल हो रहा था।

डाक्टरी रिपोर्ट सीलबन्द लिफाफे में दफ्तर पहुँची तो बड़े बाबू ने शायद उसे गौर से नहीं देखा होगा वरना उन्हें भी बी. ओ. साहब की तरह दौरा पड़ जाता। बी. ओ. साहब के चपरासी ने उनकी सेवा-टहल करने के बाद हमें इसकी भनक दी थी। हालाँकि खुद उसे पूरी तरह नहीं मालूम हो पाया था कि डाक्टरी रिपोर्ट में ऐसा क्या था।

पक्की बिल्डिंगवालों ने, यानि हमारे यहाँ उन सब लोगों ने जिनके हाथों में औजारों की जगह कलमें रहती हैं, इस बात को दबाने की कोशिश की होगी लेकिन ऐसी अनहोनी बात भला कब तक दबी रहती।

डाक्टर ने उसे ड्यूटी के लिए ‘फिट’ लिख दिया था। यह एक ताज्जुब की बात थी। बी. ओ. साहब या उनके साथियों के लिए ही नहीं, हम लोगों के लिए भी यह एक चौंकानेवाली बात थी।

यों, उसे देखे बिना, और पूरे किस्से की जानकारी न होने से शायद आपको हमारी चौंकानेवाली बात पर विश्वास न हो, लेकिन यह सचमुच एक अजीब फैसला डाक्टर ने दिया था।

पिछले पन्द्रह सालों से हम लोग साथ-साथ काम कर रहे थे। वह कोई अनोखा कारीगर तो नहीं, हाँ उसका हाथ साफ जरूर था। अक्सर ऐसे साजो-सामान जो किसी को भेंट में देने के लिए बनवाए जाते थे और जिनका खूबसूरत होना जरूरी होता था, उसके हाथों से बनकर ही निकलते थे।

यह भेंट देनेवाले सामानों की बात जान लेना जरूरी है, क्योंकि यों देखा जाए तो यही चीज इस दुर्घटना की जड़ थी।

हमारी कम्पनी में कच्चे माल की कोई किल्लत नहीं रहती। लोहा-लक्कड़, पीतल-तांबा हर चीज इफरात में मिल जाती है। कारीगर भी इतने घटिया नहीं हैं। इसलिए होता यह है कि कभी किन्हीं साहब को यह शौक पैदा होता है कि वे कोई नये डिजाइन की चीज बनवाएँ। यह भी एक संयोग है कि ऐसा शौक हमेशा घरेलू इस्तेमाल की चीजों के बारे में ही पैदा होता है। मान लीजिए, उन्हें एक दिन अचानक ख्याल आता है कि एक खूब भारी-भरकम और अनोखे डिजाइन वाली ‘राखदानी’ बनवाई जाए या एक ‘नेमप्लेट’ बनवाई जाए तो यह ख्याल दिमाग में आते ही वह चपरासी भेजकर मिस्त्री को बुलवाएँगे। हर मिस्त्री का कोई न कोई काम पिछड़ा हुआ रहता ही है इसलिए वह बुलावा मिलते ही अपने सभी पिछड़े हुए कार्यों के बारे में एक-एक उम्दा बहाने मन-ही-मन तैयार कर घबराया हुआ-सा साहब के चैम्बर की ओर जाता है। साहब मुस्कराकर उसे सामने कुर्सी पर बैठने के लिए कहते हैं। यह सौभाग्य मिस्त्रियों को कभी-कभी ही मिलता है। ऐसे मौके पर यह हौसला- अफजाई जरूरी है, क्योंकि इससे एक तो पिछली घबराहट निकल जाती है और दूसरे, आगे के काम के बारे में नई-नई तरकीबें सोचने केलिए दिमाग तेज हो जाता है। साहब फिर मोटे तौर पर अपनी मनचाही चीज का एक दिमागी नक्शा मिस्त्री को समझा देते हैं। एक अच्छे मातहत के नाते मिस्त्री और हम लोगों का तब यह फर्ज हो जाता है कि अपनी-अपनी ओर से हम भरसक कोशिश करें कि वह राखदानी या नेमप्लेट सचमुच एक नमूना बन जाय। इस जोश में हम लोग अपना चाय-नाश्ता, खाना-पीना तक भूल जाते हैं, अपने काम की तो खैर कोई बात ही नहीं। आखिर में चीज बनकर तैयार होती है, फिर हफ्तों उस पर रंग-रोगन-पालिश होता है और तब वह चमचमाती हुई चीज सचमुच इतनी दिलकश होती है कि साहब मिस्त्री को और लोगों को मुस्कराकर तारीफ की नजर से देखते हैं और हम लोग मक्खनबाजी का ठीक मौका देखकर डिजाइन के लिए उनके दिमाग की जी भर दाद देते हैं। यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता बल्कि यहाँ से इसकी शुरूआत होती है। साहब के घर आनेवाले मेहमानों-मुलाकातियों की नजर उन चीजों पर पड़ती है। वे लोग ललचाई नजरों से उन्हें देखकर उनकी तारीफ करते हैं, जहाँ भी मिलती हो, जिस दाम पर भी मिलती हो, मँगवाने की ख्वाहिश जाहिर करते हैं, और तब साहब खुशी और फ़ख़्र के साथ अपने दिमाग और मातहत लोगों की कारीगरी का राज खोलते हैं और उन कद्रदानों के लिए भी एक-एक बनवा देने का वादा करते हैं। साहब की नाक नीची न हो इसलिए हम लोग फिर उसी जोश के साथ दूसरा, तीसरा, चौथा नमूना बनाते रहते हैं। साहब के दोस्तों के अलावा जाने कौन-कौन-से नाम मिस्त्री बताते हैं, हमारे हुनर के कायल रहते हैं। अक्सर हमें मालूम नहीं रहता कि किसके लिए हम वह सामान बना रहे हैं क्योंकि बहुत कम ऐसे लोग कारखाने में आने की फुर्सत पाते हैं। हाँ, जो इक्का-दुक्का शौकिया आ पहुँचते हैं, वे जी खोलकर हम लोगों के हुनर की तारीफ करते हैं और तब बाद में मिस्त्री हमारा हौसला बढ़ाने के लिए कहते हैं कि बड़े लोगों से राहरस्म मौके पर काम आती है। हम लोग ऐसी ही उम्मीदों के बल पर ये सब काम करते रहते हैं-अपने लिए कोई चीज बनाने का सवाल यों भी नहीं उठता कि ऐसे शौक बड़े लोगों को ही जँचते हैं और दूसरे, यह हम लोगों के बूते की बात भी नहीं है-निकासी गेट पर तलाशी में कोई चीज गलती से भी अपने पास निकल जाए तो तमाशा बन जाता है। हर आदमी को अपनी इज्जत प्यारी होती है।

तो पिछले पन्द्रह सालों में ऐसी ही इज्जत से बड़े आदमियों से शाबाशी पाता हुआ वह हम लोगों के साथ काम कर रहा था। उसकी ईमानदारी और मेहनत का ही नतीजा था कि उसकी सर्विस-बुक में कहीं कोई लाल निशान नहीं लगा था। तो भी यह अनहोनी होनी थी और होकर रही। बी. ओ. साहब पिछले कुछ दिनों में काफी खुशमिजाज नजर आने लगे थे। किसी ने बताया कि साल भर के अन्दर ही वे तरक्की पाने में कामयाब हो गए हैं। इसी खुशी में वे राह चलते लोगों से मजाक करने लगे थे, काम करते हुए आदमियों पर वक्त बरबाद करने की तोहमत लगाकर हँस देते थे, तनख्वाह बाँटते हुए चिकनी-चुपड़ी जुबान में कोई बात ऐसी कह जाते जो हरामखोरी के वजन की होती। हम लोग उनकी बातों का बुरा नहीं मानते थे क्योंकि हम अच्छी तरह जानते थे कि वे मन-ही-मन हम लोगों से बहुत खुश हैं। उनकी तश्तरियाँ, पिर्च-प्याले रखने के लिए जो बक्से हम लोगों ने बनाए थे उनकी उन्होंने बड़ी तारीफ की थी।

हम छोटे लोगों के लिए किसी अफसर की नजर में चढ़ जाना बड़ी तकदीर की बात होती है। लोग जिन्दगी भर नौकरी करने पर भी बिचौलियों के मारे कभी अफसर से बात करने का मौका नहीं पाते, इन बी. ओ. साहब की खुशमिजाजी की बदौलत उसे ऐसा मौका नसीब हुआ था। वह एकाएक बी. ओ. साहब की नजर में आ गया था। गलती उसकी है कि उसने उन्हें ठीक से समझा नहीं और हम लोग भी बातों का मजा लेते रहे-कभी उसे समझाने-बुझाने की बात दिमाग में आई ही नहीं।

शुरूआत बी. ओ. साहब के हाथ में फाँस चुभने से हुई थी। एक दिन वे हाथ में पट्टी बाँधकर कारखाने में आए थे। मिस्त्री के पूछने पर उन्होंने बताया था कि रूलर पर हाथ फेरते-फेरते एक फाँस चुभ गई थी, वहीं घाव हो गया।

रूलर उसी ने बनाया था। यह एक अजीब बात है कि बनने के बाद उसमें रेकमार्क लगा होगा, पालिश हुई होगी, फिर भी कोई फाँस निकल आई। मिस्त्री को उस पर दोष नहीं मढ़ना चाहिए था और वह भी अफसर के सामने ! उस दिन के बाद जब भी साहब आते, रूलर का जिक्र छेड़कर उसकी कारीगरी पर कोई फब्ती कस देते। कुछ दिनों बाद वह साहब को आते देखकर इधर-उधर टरकने की कोशिश करने लगा था।

लकड़ी के कोटे में बहुत दिनों के बाद दो स्लीपर टीक के आ गए थे। साहब ने एक नए डिजाइन के पलंग की ख्वाहिश जाहिर की। किसी अंग्रेजी किताब में देखकर उन्होंने डिजाइन दिया था। हम लोग काम पर जुट गए। अच्छी लकड़ी पर बारीक काम करना हर कारीगर को अच्छा भी लगता है-सभी उस काम को हाथ में लेना चाहते थे, पर मिस्त्री ने छाँटकर तीन-चार आदमियों को यह काम सौंपा। वह भी हमारे साथ था। हालाँकि साहब जब-तब आकर चुटकी ले लिया करते थे।

“अरे भाई देखना, रूलर की फाँस तो हमें ही भुगतनी पड़ी थी, पलंग में फाँस रह गई तो मेम साहब हमारी खबर ले लेंगी,” साहब की ऐसी मुँहफट बातें इतना मजा देती थीं कि हम भी अक्सर उसे छेड़ देते।

इसी दौरान उसकी लड़की की शादी की बातचीत चल रही थी। अपने फण्ड से रुपया निकलवाने के लिए वह अर्जी लेकर मिस्त्री के साथ साहब के पास गया था, वहीं दान-दहेज की बात भी चली होगी। तब से एक नया शगूफा खड़ा हो गया। अब बी. ओ. साहब जब भी बढ़ईखाने में आते, वे पलंग के पास खड़े होकर कहते, “अरे भाई मिस्त्री ! यह पलंग इन्हें दहेज के लिए दे देना, हम दूसरा बनवा लेंगे,” या कभी कहते, “जरा ठीक से बनाना भाई। दहेज की चीज है, बाराती दस खामियाँ दिखाएँगे,” और धीरे-धीरे हम सभी लोगों के लिए वह पलंग ‘दहेज का पलंग’ बन गया था। जितना मन लगाकर वह उस पलंग पर काम करता था, उससे हमें कभी-कभी शक होने लगता था कि कहीं सचमुच ही उसे साहब की बात का यकीन न हो गया हो।

पलंग तो खैर रंग-रोगन होने के बाद कहाँ गया इसकी किसी को कानों-कान खबर न हुई, पर साहब जब भी बढ़ईखाने में आते, उससे कुछ-न-कुछ चुहलबाजी जरूर कर लेते।

उस दिन एक नये छोटे अफसर को लेकर बी. ओ. साहब कारखाने में घूम रहे थे। सुबह काम का वक्त था। वह अपने औजारों के बक्स को खोलकर शायद कुछ निकाल रहा था। बी. ओ. साहब के मन में बक्स के अन्दर रखे रोटी के डिब्बे को देखकर गलतफहमी पैदा हुई होगी कि वह डिब्बा भी किसी और का था।

शेड में घुसते ही उनकी नज़र उस पर पड़ी।

“यहाँ बैठे-बैठे क्या कर रहे हो ?” उन्होंने उसे टोका।

“साहब, एक औजार की जरूरत पड़ गई थी, वही लेने आया था,” वह बोला।

“नहीं, नहीं, मुझे देखकर तुम औजार का बहाना बना रहे हो। तुम जरूर रोटी खाने आये थे। वह डिब्बा यहाँ क्यों रखा है ?” उन्होंने अपने मजाकिया मूड में रौब दिखाया होगा।

“साहब, मैं तो रोज ही घर से खाना खाकर आता हूँ। इतने साल हो गये, कभी यहाँ खाना लेकर नहीं आया, वह किसी दूसरे का डिब्बा है।” उसने सफाई दी।

“तो इसका मतलब है कि डिब्बा ही नहीं, यह ‘टूलकिट’ भी किसी और का है। तुम उसका औजार चुरा रहे थे।” साहब ने अपनी तबदीली की खुशी में एक और रद्दा जमाया।

उसे मालूम होना चाहिए था कि साहब अपनी खुशी जाहिर करने के लिए यह मजाक कर रहे हैं लेकिन न मालूम छोटे अफसर की हँसी देखकर उसे गलतफहमी हुई या क्या हुआ कि हमेशा का चुप्पा, सीधा-सीदा हमारा साथी जवाबदेही पर उतारू हो गया।

“आपने मुझे चोर कैसे कहा साहब ?” वह हकलाने लगा।

“आपने मुझे चोर कहा ?”

“मैं चोर हूँ ?”

उसने लगातार ऐसे सवालों की रट लगा दी।

हम लोग गुल-गपाड़ा सुनकर बीच-बचाव करने की सोच ही रहे थे कि वह भागा-भागा मोचीखाने से एक थैला उठा लाया। यह बी. ओ. साहब के स्कूटर के लिए बन रहा नया रैक्सिन का थैला था। उसे हवा में नचाता, वह बी. ओ. साहब के पीछे-पीछे दौड़ता हुआ चिल्लाने लगा- “चोर मैं हूँ कि आप हैं ? यह थैला मेरा बन रहा है कि आपका।”

यह अच्छा हुआ कि कोई बक्स, पलंग, फूलदान या ऐसी चीजें जो बी. ओ. साहब के लिए बनी थीं, वहाँ नहीं थीं वरना वह उन सबको अपने सिर पर लाद कर उनके पीछे-पीछे भागता।

एक अजीब नजारा खड़ा हो गया था। बी. ओ. साहब बार-बार कहते, “भाई, हमारा यह मतलब नहीं था, तुम बेकार परेशान हो रहे हो।” लेकिन वह जैसे बहरा हो गया था। हारकर बी. ओ. साहब छोटे अफसर को लेकर तेज कदमों से अपने दफ्तर की ओर चलने लगे तो वह भी पीछे-पीछे चिल्लाता चला गया था।

ऐसे मरीज को डाक्टर ड्यूटी के लिए ‘फिट’ कर दे, क्या यह चौंकने की बात नहीं है?

शेखर जोशी

शेखर जोशी कथा लेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले सुपरिचित कथाकार हैं। शेखर जोशी की कहानियों का अंगरेजी, चेक, पोलिश, रुसी और जापानी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी कहानी दाज्यू पर बाल-फिल्म सोसायटी द्वारा फिल्म का निर्माण किया गया है।[

शेखर जोशी कथा लेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले सुपरिचित कथाकार हैं। शेखर जोशी की कहानियों का अंगरेजी, चेक, पोलिश, रुसी और जापानी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी कहानी दाज्यू पर बाल-फिल्म सोसायटी द्वारा फिल्म का निर्माण किया गया है।[

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