1. कानपुर सामने आँगन में फैली धूप सिमटकर दीवारों पर चढ़ गई और कंधे पर बस्ता लटकाए नन्हे-नन्हे बच्चों के झुंड-के-झुंड दिखाई दिए, तो एकाएक ही मुझे समय का आभास हुआ। घंटा
जैसी कहावत है, यह पिछली नशे की रात के बाद का सवेरा था. जब मैं पी के औंधा हो रहा था. एक ऐसा अनुभव जो हमेशा याद रहता है और जिसके कारण
Moreपुराने ज़मींदार का पसीना छूट गया, यह सुनकर कि इनकम टैक्स विभाग का कोई अफ़सर आया है और उनके हिसाब–किताब के रजिस्टरऔर बही–खाते चेक करना चाहता है. अब क्या होगा मुनीम जी?
More“अरी ओ, ई का कान में ठूंसी रहती हो, कुछ पढ़ लिख लिया करो।” “अरे दादी का कह रही हो” (कान से हेडफोन निकाल कर उर्मिला पूछती है) “हम ई कह रहे
Moreट्यूशन में बैठे -बैठे आशिमा की कमर में दर्द होने लगता है, वो जब अपने कमर को सीधा करती है और एक सांस भरती है तो उसका वक्ष थोड़ा फूल जाता है।
Moreअलसुबह नींद खुलते कैलेंडर में छुट्टी देख रहा था. सब कुछ बदला पर लाला रामस्वरूप का कैलेंडर आज भी मेरी आवश्यकता है, कमरे में ठीक सामने वाली दीवार पर उसका होना. आते–जाते
Moreअजीब बात थी, ख़ुद कमरे में होते हुए भी बाशी को कमरा ख़ाली लग रहा था। उसे काफी देर हो गई थी कमरे में आए–या शायद उतनी देर नहीं हुई थी जितनी
Moreकनाट सरकस के बाग में जहाँ नई दिल्ली की सब सड़कें मिलती हैं, जहाँ शाम को रसिक और दोपहर को बेरोजगार आ बैठते हैं, तीन आदमी, खड़ी धूप से बचने के लिए,
More‘‘ऐ मर कलमुँहे !’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा, ‘‘तोरे पेट में फोनोगिराफ उलियान बा का, जौन
Moreएक जगह महफ़िल जमी थी। मिर्ज़ा ग़ालिब वहां से उकता कर उठे। बाहर हुआदार मौजूद था। उस में बैठे और अपने घर का रुख़ किया। हवादार से उतर कर जब दीवान-ख़ाने में
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