कवियों को ढूँढ़ो

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कवियों को ढूँढो, मेरे दोस्त ने कहा वे उन चीज़ों के बारे में बातें नहीं करेंगे जिनके बारे में तुम और मैं बातें करते हैं वे आर्थिक एकीकरण या वित्तीय चकबंदी की

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प्रार्थना

मैंने नहीं देखा ईश्वर को कभी महसूस नहीं किया उसके स्पर्श को नहीं देखा प्रार्थनाओं को पूरा होते बस तुम्हें खिलखिलाते हुए देखती हूँ तो गूंजने लगती है शंखध्वनि सी उभरने लगता

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आजकल कानों में आवाज़ें बहुत आती हैं

एक आजकल कानों में आवाज़ें बहुत आती हैं इधर से चीखने, रोने, विलाप करने की, उधर से धमकियाँ, और ग़ालियाँ रंजिश से भरी वहाँ से लूट लो, पकड़ो इसे, अब छोड़ना मत

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महाब्राह्मण

वहाँ कोई नहीं है धिकते हुए लोहे की तरह लगती हैं अपनी ही सांसें खाँसते हुए अपाढ़ है उठना-बैठना आवाज़ जो रहती थी समय-असमय में तत्पर वह भी काया के भीतर कहीं

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यूटोपिया

उसने अपनी जेब में इतने अहंकार से हाथ डाला कि उस पल मुझे लगा काश ! किसी के पास जेब न होती तो कितना अच्छा होता आख़िर क्यों हो किसी के पास

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राहुल तोमर की कविताएँ

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1) किक्की के लिए तुम्हें बढ़ते हुए देखने से ज़्यादा सुखद मेरे लिए और कुछ नहीं परन्तु तुम ऐसे वक़्त में बड़ी हो रही हो मेरी बच्ची जब मानवता की हांफनी छूटी

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नकली कवियों की वसुंधरा

धन्य यह वसुंधरा! मुख में इतनी सारी नदियों का झाग, केशों में अंधकार! एक अंतहीन प्रसव-पीड़ा में पड़ी हुई पल-पल मनुष्य उगल रही है, नगर फेंक रही है, बिलों से मनुष्य निकल

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पूँजीवादी समाज के प्रति

इतने प्राण, इतने हाथ, इतनी बुद्धि इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद जितना ढोंग, जितना भोग

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आवाज़

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एक आवाज़ है तुम्हारे अंदर जो तुम्हें पूरे दिन सुनाई देती है मुझे महसूस होता है कि यह सही है मेरे लिए, मगर मैं जानता हूँ कि यह गलत है कोई शिक्षक,

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अंत्येष्टि अवसाद

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वह मेरा उत्तर, मेरा दक्षिण, मेरा पूर्व और पश्चिम था, मेरा काम करने का सप्ताह और मेरा रविवार का आराम, मेरी दोपहर, मेरी आधी रात, मेरी बात, मेरा गाना; मैंने सोचा था

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