आषाढ़

यह आषाढ़ जो तुमने मां के साथ रोपा था हमारे खेतों में घुटनों तक उठ गया है अगले इतवार तक फूल फूलेंगे कार्तिक पकेगा हमारा हँसिया झुकने से पहले हर पौधा तुम्हारी

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मैं हार गई

जब कवि-सम्मेलन समाप्त हुआ तो सारा हॉल हँसी-कहकहों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था। शायद मैं ही एक ऐसी थी, जिसका रोम-रोम क्रोध से जल रहा था। उस सम्मेलन की

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हास्यरस

लगभग आधे घंटे में कार्रवाई पूरी हो गई और हम लोग रजिस्ट्रार के कमरे से बाहर निकल आए। तीन मित्र जिन्होंने गवाही दी, पत्नी, और मुझे लेकर, हम पाँच लोग हैं। बाहर

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ननद-भौजाई

पदुमा बहुत दुखी और अत्यन्त चिन्तित-सी आँगन में आई। आँखों में अपराध और पश्चात्ताप की सलज्ज रेखा थी। अपनी भौजी से बिना कुछ बोले ही, पूरब की कोठरी में घुस गई। रसोईघर

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घर की याद

आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है, रात भर गिरता रहा है, प्राण मन घिरता रहा है, अब सवेरा हो गया है, कब सवेरा हो गया है, ठीक से

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बच्चन — आदमी और कवि

देह के बच्चन, मन के बच्चन, समाज के बच्चन, सभ्यता और संस्कृति के बच्चन, सरकार के बच्चन, जनता के बच्चन और काव्य के बच्चन, ये सब बच्चन मुझे एक जैसे ही लगे

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बग़ैर इजाज़त

नईम टहलता टहलता एक बाग़ के अन्दर चला गया… उसको वहां की फ़ज़ा बहुत पसंद आई। घास के एक तख़्ते पर लेट कर उसने ख़ुद कलामी शुरू कर दी। “कैसी पुरफ़िज़ा जगह

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चाँदनी की पाँच परतें

चाँदनी की पाँच परतें हर परत अज्ञात है। एक जल में एक थल में एक नीलाकाश में एक आँखों में तुम्हारे झिलमिलाती एक मेरे बन रहे विश्वास में क्या कहूँ, कैसे कहूँ

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नयी कविता एवं मेरी रचना प्रक्रिया

यह विषय मेरे लिए नया है। कोई सोच नहीं सकता कि वह किस तर्ज से लिखता है। आधुनिक काव्य की जो रचना-प्रक्रिया है उस पर निर्णय लेना पाठकों का कार्य है। आधुनिक

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