क्रूरता

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा क्रोध अकेला न होगा वह संगठित

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जीना मुश्किल है कि आसान

जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सर-ए-मिंबर है किस के है क़त्ल का सामान ज़रा देख तो

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धर्म संकट

शाम का समय था, हम लोग प्रदेश, देश और विश्‍व की राजनीति पर लंबी चर्चा करने के बाद उस विषय से ऊब चुके थे। चाय बड़े मौके से आई, लेकिन उस ताजगी

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एक दिन इसी तरह

(वीरेन के लिए) एक दिन इसी तरह किसी फ़ाइल के भीतर या कविता की किताब के पन्नों में दबा तुम्हारा ख़त बरामद होगा मैं उसे देखूँगा, आश्चर्य से, ख़ुशी से खोलूँगा उसे,

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मोहन राकेश का पत्र राजेंद्र यादव के नाम

डी.ए.वी. कॉलेज, जालंधर 13-5-55 माई डियर राजेन्द्र यादव, दोस्त उपन्यास की पांडुलिपि भेजने में दो दिन की देरी हो ही गई, जो अपनी आदतों को देखते हुए बहुत कम है। ख़ैर, पार्सल

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वे दस मिनट

कोलकाता से चेन्नई के लिए ट्रेन में बैठा था। 24 घंटे का सफर। साथ में दो एक किताबें रख ली थी। नीचे की बर्थ पाकर संतुष्ट था। सामान लगाया और टीटी से

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कविता क्या है

कविता क्या है हाथ की तरफ़ उठा हुआ हाथ देह की तरफ़ झुकी हुई आत्मा मृत्यु की तरफ़ घूरती हुई आँखें क्या है कविता कोई हमला हमले के बाद पैरों को खोजते

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पतंग

(एक) उनके रक्तों से ही फूटते हैं पतंग के धागे और हवा की विशाल धाराओं तक उठते चले जाते हैं जन्म से ही कपास वे अपने साथ लाते हैं धूप गरुड़ की

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जनता का साहित्य किसे कहते हैं?

जिंदगी के दौरान जो तजुर्बे हासिल होते हैं, उनसे नसीहतें लेने का सबक तो हमारे यहाँ सैकड़ों बार पढ़ाया गया है। होशियार और बेवकूफ में फर्क बताते हुए, एक बहुत बड़े विचारक

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नयी कविता : प्रयोग के आयाम

तार सप्तक की भूमिका प्रस्तुत करते समय इन पंक्तियों के लेखक में जो उत्साह था, उस में संवेदना की तीव्रता के साथ निःसन्देह अनुभवहीनता का साहस भी रहा होगा। संवेदना की तीव्रता

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