मैं कहीं और भी होता हूँ

मैं कहीं और भी होता हूँ जब कविता लिखता हूँ कुछ भी करते हुए कहीं और भी होना धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है हर वक्त बस वहीं होना जहाँ कुछ कर

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जवाब हवा में उड़ रहा है

कितने रास्ते तय करे आदमी कि तुम उसे इनसान कह सको ? कितने समंदर पार करे एक सफेद कबूतर कि वह रेत पर सो सके ? हाँ, कितने गोले दागे तोप कि

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कई बार

एक जीना जग जाहिर एक जीना चुपचाप दो-दो प्रकार से जीना पड़ता है एक जीवन कई बार अकस्‍मात एक दिन खत्‍म होने से पहले अँजुली भर पानी में सिकुड़ते आकाश की तड़प

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नोबल भाषण | नदीन गोर्डिमर

महामहिम, शाही परिवार, महानुभाव, पुरस्कार विजेता साथियो, देवियो और सज्जनो, जब मेरे एक दोस्त की छह वर्षीय बेटी ने उसके पिता को किसी को यह कहते हुए सुना कि मुझे नोबेल पुरस्कार

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फिदेल कास्त्रो

साल भर बाद फिदेल कास्त्रो 90 के हो जाएँगे। वे लंबे समय से बीमार हैं। करीब एक सदी का जीवन उनका हो रहा है। 20 वीं सदी के संघर्षों और यातनाओं और विडंबनाओं और उत्पातों के

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ऐसे ही किसी दिन

उस सोमवार की सुबह, गर्म और बिना बारिश वाली हुई। तड़के जागने वाले औरेलियो एस्कोवार ने, जो दाँतों का बिना डिग्री वाला डाक्टर था, अपना क्लीनिक छह बजे ही खोल दिया। उसने

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हर तरफ धुआँ है

हर तरफ धुआँ है हर तरफ कुहासा है जो दाँतों और दलदलों का दलाल है वही देशभक्त है अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है – तटस्थता यहाँ कायरता के चेहरे पर

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काकी

उस दिन बड़े सबेरे जब श्यामू की नींद खुली तब उसने देखा – घर भर में कुहराम मचा हुआ है। उसकी काकी – उमा – एक कम्बल पर नीचे से ऊपर तक

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इस दौर में

हत्यारे और भी नफ़ीस होते जाते हैं मारे जाने वाले और भी दयनीय वह युग नहीं रहा जब बन्दी कहता था वैसा ही सुलूक़ करो मेरे साथ जैसा करता है राजा दूसरे

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