हम सब तो खड़े हैं मक़तल में

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नज़्म

हम सब तो खड़े हैं मक़तल में क्या हमको ख़बर इस बात की है
जिस जुल्म को हम सौग़ात कहें सौग़ात वो काली रात की है
हम जिसको मसीहा कह बैठे वो दर्द का चारा क्या करता
उसने तो कुरेदा ज़ख्मों को वो ज़ख्म हमारे क्या भरता
हम मेहनत करके मर जाएँ और उसको दुआएँ देते रहें
वो आख़िरी क़तरा भी ले ले हम अपना लहू ख़ैरात करें

पहले भी मसीहा आए थे जो दर्से-मुहब्बत दे के गए
हम सब में रहे, हम सब के हुए, हम सब में जिए, हम सब में मरे
वो धूप जो हमपर तेज़ रही उसमें तो बदन उनका भी जला
जो दर्स हमारी ख़ातिर थे उनपे तो अमल उनका भी हुआ
जो सोचते थे वो बोलते थे, जो बोलते थे वो करते थे
औरों की ख़ातिर जीते थे औरों के लिए वो मरते थे

और आज भी कैसा शोर है ये के कोई मसीहा आया है
दुख-दर्द हमारे ले लेगा ये कैसा भरम फैलाया है
उसके तो बदन पे रेशम है और अपने बदन मुश्किल से ढंकें
उसके तो शिकम में मेवे हैं और अपने शिकम आतिश से जलें
उसके तो हवाई दौरे हैं और रेंग के हमको है जीना
वो बात करे तो फूल झड़े हमको होंठों को है सीना

और आज हमारे सीनों में ये नफ़रत फैल गई कैसी
कल हम जिनसे मिलते थे गले अब उनपे उठाई है बरछी
अलगाव की बातें करने में दिल ख़ुद ही मलामत करता था
अब ज़ह्र भरी इन बातों में ये फ़ख्र सा होता है कैसा
बेखौफ़ सभी से मिलते थे इस बात को तो कुछ दिन ही हुए
और कुछ ही दिन में मिलते हैं हम शक़ कितने आँखों में लिए

गुमनाम से हैं वो कौन बशर जो भीड़ की सूरत आते हैं
एक पल में बहा मासूम लहू फिर भीड़ में ही खो जाते हैं
और हद है के इस वहशत को कहते हैं बहुत से लोग रवा
क़ातिल तारीख़ के गुम्बद से अब नफ़रत को देते हैं सदा
ये कैसा मसीहा है जिसने बतला ही दिया हम एक नहीं
हम सच्चे हैं वो बातिल हैं हम ही हैं भले वो नेक नहीं

इक दम तो ठहर कर सोचो भी हम तुम ज़िन्दा किस हाल में हैं
हर एक क़दम पे हैं बेबस हम किस जी के जंजाल में हैं
अपने जैसे मज़बूरों से मुख़्तार की शह पे लड़ते हैं
हम ख़ाक में लिथड़े रहते हैं वो तख़्त पे बैठे रहते हैं
हैरत है वो समझाते हैं हमलोग समझ भी जाते हैं
अपने जैसों की बस्ती को हम पूँक के वापस आते हैं

इस रंग, नस्ल और मज़हब का हमने तो मज़ा है ख़ूब चखा
इंसाँ होकर इंसानों का हमने तो लहू है खूब पिया
अब अपने मसीहा से पूछे ये क़त्लो-ग़ारत है कबतक
कबतक हैं मुहब्बत पर पहरे आजाद है ये नफ़रत कबतक
कबतक वो हमको बाँटेगा कबतक वो हमें बिकवाएगा
दिल उसका भरेगा आख़िर कब कबतक वो सितम ये ढाएगा

हम अब भी अगर ख़ामोश रहें हम देख न पाएँ सच है क्या
गर यूँ ही हमपे छाया रहा उसका वो जादू, उसका नशा
हम सब कातिल कहलाएँगे हमसब बातिल कहलाएँगे
अब तू ही बता क्या कोई सहर इस काली अँधेरी रात की है
हम सब तो खड़े हैं मक़तल में क्या हमको ख़बर इस बात की है

[मक़तल-वधस्थल, चारा-चिकित्सा, दर्से-मुहब्बत-प्रेम का उपदेश, शिकम-पेट, आतिश-आग, मलामत-भर्त्सना, फ़ख्र-गर्व, बशर-व्यक्ति, रवा-उचित, तारीख़-इतिहास, बातिल-झूठा, सहर-सुबह]

संजय कुमार कुंदन

संजय कुमार कुंदन (जन्म - ०७/0२/१९५५) गंगा-जमुनी तहज़ीब के माने हुए व् मशहूर शायर हैं. अब तक आपकी गज़लों और नज़्मों के ४ संग्रह -'बेचैनियाँ', 'एक लड़का मिलने आता है', 'तुम्हें क्या बेक़रारी है'और 'भले तुम और भी नाराज़ हो जाओ'प्रकाशित हो चुके हैं. आपसे sanjaykrkundan@gmail.com पे बात की जा सकती है.

संजय कुमार कुंदन (जन्म - ०७/0२/१९५५) गंगा-जमुनी तहज़ीब के माने हुए व् मशहूर शायर हैं. अब तक आपकी गज़लों और नज़्मों के ४ संग्रह - 'बेचैनियाँ', 'एक लड़का मिलने आता है', 'तुम्हें क्या बेक़रारी है' और 'भले तुम और भी नाराज़ हो जाओ' प्रकाशित हो चुके हैं. आपसे sanjaykrkundan@gmail.com पे बात की जा सकती है.

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