एक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए दो दिन की ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए भूले हैं रफ़्ता-रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम किश्तों में ख़ुदकुशी का मज़ा हमसे पूछिए आगाज़े-आशिक़ी का मज़ा आप
कोई पास आया सवेरे सवेरे मुझे आज़माया सवेरे सवेरे मेरी दास्ताँ को ज़रा सा बदल कर मुझे ही सुनाया सवेरे सवेरे जो कहता था कल शब सँभलना सँभलना वही लड़खड़ाया सवेरे सवेरे
Moreज़िस्म की भूख कहें या हवस का ज्वार कहें। सतही जज्बे को मुनासिब नहीं है प्यार कहें॥ बारहा फ़र्द की अज़मत ने जिसे मोड़ दिया। हम भला कैसे उसे वक़्त की रफ़्तार
Moreतुम मुझे पहन सकते हो कि मैं ने अपने आप को धुले हुए कपड़े की तरह कई दफ़अ’ निचोड़ा है कई दफ़अ’ सुखाया है तुम मुझे चबा सकते हो कि मैं चूसने
Moreएक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए दो दिन की ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए भूले हैं रफ़्ता-रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम किश्तों में ख़ुदकुशी का मज़ा हमसे पूछिए आगाज़े-आशिक़ी का मज़ा आप
Moreइस उम्र के बाद उस को देखा! आँखों में सवाल थे हज़ारों होंटों पे मगर वही तबस्सुम! चेहरे पे लिखी हुई उदासी लहजे में मगर बला का ठहराओ आवाज़ में गूँजती जुदाई
Moreलुत्फ़ वो इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है रंज भी ऐसे उठाए हैं कि जी जानता है जो ज़माने के सितम हैं वो ज़माना जाने तू ने दिल इतने सताए
Moreहमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा’दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं
Moreइश्क़ का रोग तो विर्से में मिला था मुझको दिल धड़कता हुआ सीने में मिला था मुझ को। हाँ ये काफ़िर उसी हुजरे में मिला था मुझको एक मोमिन जहाँ सज्दे में
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