कई बार

एक जीना जग जाहिर एक जीना चुपचाप दो-दो प्रकार से जीना पड़ता है एक जीवन कई बार अकस्‍मात एक दिन खत्‍म होने से पहले अँजुली भर पानी में सिकुड़ते आकाश की तड़प

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इस दौर में

हत्यारे और भी नफ़ीस होते जाते हैं मारे जाने वाले और भी दयनीय वह युग नहीं रहा जब बन्दी कहता था वैसा ही सुलूक़ करो मेरे साथ जैसा करता है राजा दूसरे

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आप उसे फ़ोन करें

आप उसे फ़ोन करें तो कोई ज़रूरी नहीं कि उसका फ़ोन खाली हो हो सकता है उस वक़्त वह चांद से बतिया रही हो या तारों को फ़ोन लगा रही हो वह

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संध्या के संग लौट आना तुम

जाओ, पर संध्‍या के संग लौट आना तुम, चाँद की किरन निहारते न बीत जाय रात। कैसे बतलाऊँ, इस अँधियारी कुटिया में कितना सूनापन है, कैसे समझाऊँ, इन हलकी-सी साँसों का कितना

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स्त्री के बारे में

किसी अँधेरे कमरे में सीलन भरे कोने की ठंडी दीवार से बात करते हुए जो स्त्री रो रही है क्या कोई उस स्त्री के बारे में जानता है? जो उसके बारे में

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एक दिन इसी तरह

(वीरेन के लिए) एक दिन इसी तरह किसी फ़ाइल के भीतर या कविता की किताब के पन्नों में दबा तुम्हारा ख़त बरामद होगा मैं उसे देखूँगा, आश्चर्य से, ख़ुशी से खोलूँगा उसे,

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आपकी हँसी

निर्धन जनता का शोषण है कह कर आप हँसे लोकतंत्र का अंतिम क्षण है कह कर आप हँसे सबके सब हैं भ्रष्टाचारी कह कर आप हँसे चारों ओर बड़ी लाचारी कह कर

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उस समय भी

जब हमारे साथी-संगी हमसे छूट जाएँ जब हमारे हौसलों को दर्द लूट जाएँ जब हमारे आँसुओं के मेघ टूट जाएँ उस समय भी रुकना नहीं चलना चाहिए टूटे पंख से नदी की

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