नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ मुझे ऊँचाइयों का वह अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा
हत्यारे और भी नफ़ीस होते जाते हैं मारे जाने वाले और भी दयनीय वह युग नहीं रहा जब बन्दी कहता था वैसा ही सुलूक़ करो मेरे साथ जैसा करता है राजा दूसरे
Moreआप उसे फ़ोन करें तो कोई ज़रूरी नहीं कि उसका फ़ोन खाली हो हो सकता है उस वक़्त वह चांद से बतिया रही हो या तारों को फ़ोन लगा रही हो वह
Moreजाओ, पर संध्या के संग लौट आना तुम, चाँद की किरन निहारते न बीत जाय रात। कैसे बतलाऊँ, इस अँधियारी कुटिया में कितना सूनापन है, कैसे समझाऊँ, इन हलकी-सी साँसों का कितना
Moreकिसी अँधेरे कमरे में सीलन भरे कोने की ठंडी दीवार से बात करते हुए जो स्त्री रो रही है क्या कोई उस स्त्री के बारे में जानता है? जो उसके बारे में
More(वीरेन के लिए) एक दिन इसी तरह किसी फ़ाइल के भीतर या कविता की किताब के पन्नों में दबा तुम्हारा ख़त बरामद होगा मैं उसे देखूँगा, आश्चर्य से, ख़ुशी से खोलूँगा उसे,
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