आँकड़ों की बीमारी

एक बार मुझे आँकड़ों की उल्टियाँ होने लगीं गिनते गिनते जब संख्या करोड़ों को पार करने लगी मैं बेहोश हो गया होश आया तो मैं अस्पताल में था खून चढ़ाया जा रहा

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एक तुम्हारा होना

एक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है, बेज़ुबान छत दीवारों को घर कर देता है। ख़ाली शब्दों में आता है ऐसे अर्थ पिरोना गीत बन गया-सा लगता है घर का कोना-कोना

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अंतिम ऊँचाई

कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं, हमारे चारों ओर नहीं। कितना आसान होता चलते चले जाना यदि केवल हम चलते होते बाक़ी सब रुका

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पानी

आदमी तो आदमी मैं तो पानी के बारे में भी सोचता था कि पानी को भारत में बसना सिखाऊँगा सोचता था पानी होगा आसान पूरब जैसा पुआल के टोप जैसा मोम की

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लाजवंती

‘हथ लायाँ कुमलान नी लाजवन्ती दे बूटे।’ (ए सखि ये लाजवंती के पौधे हैं, हाथ लगाते ही कुम्हला जाते हैं.) (पंजाबी गीत) बटवारा हुआ और बेशुमार ज़ख़्मी लोगों ने उठ कर अपने

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आँसू बाँधे हैं मैंने

आँसू बाँधे मैंने गठरिया में … अपने भी हैं और पराए भी हैं ये उपराए हैं तो तराए भी हैं ये आप आ गये हैं बराए भी हैं ये साधे हैं मैंने

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एक मुर्दे का बयान

मैं एक अदृश्य दुनिया में, न जाने क्या कुछ कर रहा हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है- न मेरी कविताएँ हैं, न मेरे पाठक हैं न मेरा अधिकार है यहाँ तक

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असंबद्ध

कितनी ही पीड़ाएँ हैं जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं ऐसी भी होती है स्थिरता जो हूबहू किसी दृश्य में बंधती नहीं ओस से निकलती है सुबह मन को गीला करने की जि़म्मेदारी

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तेरे आने की जब ख़बर महके

तेरे आने की जब ख़बर महके तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके शाम महके तेरे तसव्वुर से शाम के बाद फिर सहर महके रात भर सोचता रहा तुझको ज़हन-ओ-दिल मेरे रात भर

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आज मैं अकेला हूँ

(1) आज मैं अकेला हूँ अकेले रहा नहीं जाता। (2) जीवन मिला है यह रतन मिला है यह धूल में कि फूल में मिला है तो मिला है यह मोल-तोल इसका अकेले

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