मैंने पहली बार महसूस किया है कि नंगापन अन्धा होने के खिलाफ़ एक सख्त कार्यवाही है उस औरत की बगल में लेटकर मुझे लगा कि नफ़रत और मोमबत्तियाँ जहाँ बेकार साबित हो
एक बार मुझे आँकड़ों की उल्टियाँ होने लगीं गिनते गिनते जब संख्या करोड़ों को पार करने लगी मैं बेहोश हो गया होश आया तो मैं अस्पताल में था खून चढ़ाया जा रहा
Moreएक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है, बेज़ुबान छत दीवारों को घर कर देता है। ख़ाली शब्दों में आता है ऐसे अर्थ पिरोना गीत बन गया-सा लगता है घर का कोना-कोना
Moreकितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं, हमारे चारों ओर नहीं। कितना आसान होता चलते चले जाना यदि केवल हम चलते होते बाक़ी सब रुका
Moreआँसू बाँधे मैंने गठरिया में … अपने भी हैं और पराए भी हैं ये उपराए हैं तो तराए भी हैं ये आप आ गये हैं बराए भी हैं ये साधे हैं मैंने
Moreमैं एक अदृश्य दुनिया में, न जाने क्या कुछ कर रहा हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है- न मेरी कविताएँ हैं, न मेरे पाठक हैं न मेरा अधिकार है यहाँ तक
Moreतेरे आने की जब ख़बर महके तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके शाम महके तेरे तसव्वुर से शाम के बाद फिर सहर महके रात भर सोचता रहा तुझको ज़हन-ओ-दिल मेरे रात भर
More(1) आज मैं अकेला हूँ अकेले रहा नहीं जाता। (2) जीवन मिला है यह रतन मिला है यह धूल में कि फूल में मिला है तो मिला है यह मोल-तोल इसका अकेले
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