मैं फ़िलॉसफ़र नहीं हूँ

मैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ कि मैं लिख नहीं सकता, क्योंकि दिमाग में ख़यालात इतने बारीक आते हैं कि जिनको जाहिर करने के लिए मुझे भाषा नहीं मिलती। आप खुद

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मेंटल

हम सब लोग उसे पागल करार दे चुके थे। शक-शुबह की कहीं कोई गुंजाइश नहीं थी। इस किस्से से पहले वह हम लोगों की तरह ही नॉर्मल था। पिछले पन्द्रह सालों में

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औरतें

कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कूदकर जान दी थी ऐसा पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज़ है और कुछ औरतें अपनी इच्छा से चिता में जलकर मरी थीं ऐसा धर्म की किताबों

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सवाल ज्यादा हैं

पुराने शहर उड़ना चाहते हैं लेकिन पंख उनके डूबते हैं अक्सर खून के कीचड़ में! मैं अभी भी उनके चौराहों पर कभी भाषण देता हूँ जैसा कि मेरा काम रहा वर्षों से

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लिहाफ़

जब मैं जाड़ों में लिहाफ़ ओढ़ती हूँ तो पास की दीवार पर उसकी परछाई हाथी की तरह झूमती हुई मालूम होती है। और एकदम से मेरा दिमाग बीती हुई दुनिया के पर्दों

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बहता पानी निर्मला

मुझे बचपन से नक़्शे देखने का शौक़ है। आप समझेंगे कि कुछ भूगोल विज्ञान की तरफ़ प्रवृत्ति होगी – नहीं, सो बात नहीं; असल बात यह है कि नक्शों के सहारे दूर-दुनिया

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लेखक

प्रात:काल महाशय प्रवीण ने बीस दफ़ा उबाली हुई चाय का प्याला तैयार किया और बिना शक्कर और दूध के पी गये। यही उनका नाश्ता था। महीनों से मीठी, दूधिया चाय न मिली

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संबंध

तुम्‍हारी देह से छूटा हुआ पहला बच्‍चा रो रहा था तुम्‍हारी देह के किनारे और तुम्‍हारी छाती से दूध छूट नहीं रहा था तुम हार गई, माँ भी और दादी और तुम्‍हें

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चुप्पा आदमी

आदमी के चुप रहने का मतलब यह तो नहीं कि उसके भीतर कोई हलचल नहीं है फिर भी उन्हें पसंद है चुप्पा आदमी चुप रहने से बाहर सब कुछ शांत रहता है

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कवि व्यभिचारी चोर

एक दिन एक कवि ने शिकायत की कि ‘आप हिंदी के लेखकों को ही क्यों ठोकते हैं? अन्य भाषाओं वाले पढ़ते होंगे, तो क्या सोचते होंगे?’ ‘न ठोकता, तो तुम क्या यह

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