अश्लील

शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अख़बारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।

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मेरे स्वप्न

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आएँगे इस बूढ़े पीपल की छाया में सुस्ताने आएँगे हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेड़ो मत हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आएँगे थोड़ी आँच

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रात आधी

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने। फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में और चारों ओर दुनिया सो रही थी, तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं

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पगली का पत्र

तुम कहोगे कि छि: इतनी स्वार्थ-परायणता! पर प्यारे, यह स्वार्थ-परायणता नहीं है, यह सच्चे हृदय का उद्गार है, फफोलों से भरे हृदय का आश्वासन है, व्यथित हृदय की शान्ति है, आकुलता भरे

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देह की मुंडेर पे

एक निजी कथन से अपनी बात शुरू करना चाहती हूँ। मैं कवि हूँ, लेकिन हर समय नहीं। स्वतंत्र भी मैं उतनी ही हूँ जितना अपने को होने देती हूँ। लेकिन स्त्री हूँ,

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न जाने हुई बात क्या

न जाने हुई बात क्या मन इधर कुछ बदल-सा गया है मुझे अब बहुत पूछने तुम लगी हो उधर नींद थी इन दिनों तुम जगी हो यही बात होगी अगर कुछ न

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प्रेमपत्र

किताब से निकाल ले जायेगा प्रेमपत्र गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खायेगा चोर आयेगा तो प्रेमपत्र ही चुराएगा जुआरी प्रेमपत्र ही दांव लगाएगा ऋषि आयेंगे तो दान में मांगेंगे प्रेमपत्र बारिश आयेगी

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दो पन्ने

रोशनदान से झांकती ज़िंदगी अगर दरवाज़े से आ जाती तो वो मज़ा ना आता। धीरे-धीरे धूप का दीवारों पर चढ़ना फिर ताप को बढ़ाना और अंत में छत को छूते हुए कमरे

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टिंडे

“कभी कभी सोचता हूँ, एक डायरी खरीदकर उसका नाम तुम्हारे नाम पर रख दूँ।” “अच्छा, क्यों?” “क्योंकि मैं जैसे तुमसे अपने मन की सारी बातें करता हूँ, वैसे उसमें लिख दिया करूँगा।”

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दिनकर का पत्र जे.पी के नाम

पटना 09-11-58 मान्‍यवर जयप्रकाशजी, प्रणाम! मानवीय गुणों पर जोर देते हुए आपने अभी हाल में जो बयान दिया है उसकी कतरन मैंने पास रख ली है और उसे कई बार पढ़ गया

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