शहर में ऐसा शोर था कि अश्लील साहित्य का बहुत प्रचार हो रहा है। अख़बारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्लील पुस्तकें बिक रही हैं।
Moreमेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आएँगे इस बूढ़े पीपल की छाया में सुस्ताने आएँगे हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेड़ो मत हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आएँगे थोड़ी आँच
Moreतुम कहोगे कि छि: इतनी स्वार्थ-परायणता! पर प्यारे, यह स्वार्थ-परायणता नहीं है, यह सच्चे हृदय का उद्गार है, फफोलों से भरे हृदय का आश्वासन है, व्यथित हृदय की शान्ति है, आकुलता भरे
Moreएक निजी कथन से अपनी बात शुरू करना चाहती हूँ। मैं कवि हूँ, लेकिन हर समय नहीं। स्वतंत्र भी मैं उतनी ही हूँ जितना अपने को होने देती हूँ। लेकिन स्त्री हूँ,
Moreन जाने हुई बात क्या मन इधर कुछ बदल-सा गया है मुझे अब बहुत पूछने तुम लगी हो उधर नींद थी इन दिनों तुम जगी हो यही बात होगी अगर कुछ न
More“कभी कभी सोचता हूँ, एक डायरी खरीदकर उसका नाम तुम्हारे नाम पर रख दूँ।” “अच्छा, क्यों?” “क्योंकि मैं जैसे तुमसे अपने मन की सारी बातें करता हूँ, वैसे उसमें लिख दिया करूँगा।”
Moreपटना 09-11-58 मान्यवर जयप्रकाशजी, प्रणाम! मानवीय गुणों पर जोर देते हुए आपने अभी हाल में जो बयान दिया है उसकी कतरन मैंने पास रख ली है और उसे कई बार पढ़ गया
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