छोटे से आंगन में माँ ने लगाए हैं तुलसी के बिरवे दो पिता ने उगाया है बरगद छतनार मैं अपना नन्हा गुलाब कहाँ रोप दूँ! मुट्ठी में प्रश्न लिए दौड़ रहा हूं
Moreकोई अधूरा पूरा नहीं होता और एक नया शुरू होकर नया अधूरा छूट जाता शुरू से इतने सारे कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते परंतु इस असमाप्त – अधूरे से
Moreएक देश है! गणतंत्र है! समस्याओं को इस देश में झाड़-फूँक, टोना-टोटका से हल किया जाता है! गणतंत्र जब कुछ चरमराने लगता है, तो गुनिया बताते हैं कि राष्ट्रपति की बग्घी के
Moreधूप कोठरी के आइने में खड़ी हँस रही है पारदर्शी धूप के पर्दे मुस्कराते मौन आँगन में मोम-सा पीला बहुत कोमल नभ एक मधुमक्खी हिलाकर फूल को बहुत नन्हा फूल उड़ गई
Moreआप उसे फ़ोन करें तो कोई ज़रूरी नहीं कि उसका फ़ोन खाली हो हो सकता है उस वक़्त वह चांद से बतिया रही हो या तारों को फ़ोन लगा रही हो वह
Moreजाओ, पर संध्या के संग लौट आना तुम, चाँद की किरन निहारते न बीत जाय रात। कैसे बतलाऊँ, इस अँधियारी कुटिया में कितना सूनापन है, कैसे समझाऊँ, इन हलकी-सी साँसों का कितना
Moreकिसी अँधेरे कमरे में सीलन भरे कोने की ठंडी दीवार से बात करते हुए जो स्त्री रो रही है क्या कोई उस स्त्री के बारे में जानता है? जो उसके बारे में
Moreहस्ती अपनी हबाब की सी है ये नुमाइश सराब की सी है नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए पंखुड़ी इक गुलाब की सी है बार-बार उस के दर पे जाता हूँ हालत
Moreउधर के चोर भी अजीब हैं लूट और डकैती के अजीबो-गरीब किस्से – कहते हैं ट्रेन-डकैती सात बजते-बजते संपन्न हो जाती है क्योंकि डकैतों को जल्दी सोने की आदत है और चूँकि
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