जूते

जिन्होंने ख़ुद नहीं की अपनी यात्राएँ दूसरों की यात्रा के साधन ही बने रहे एक जूते का जीवन जिया जिन्होंने यात्रा के बाद उन्हें छोड़ दिया गया घर के बाहर।

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एक टूटता हुआ घर

एक टूटते हुए घर की चीखें दूर-दूर तक सुनी जाती हैं कान दिए लोग सुनते हैं चेहरे पर कोफ्त लपेटे नींद की गोलियाँ निगलने पर भी वह टूटता हुआ घर सारी-सारी रात

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कम से कम एक दरवाजा

चाहे नक्काशीदार एंटीक दरवाज़ा हो या लकड़ी के चिरे हुए फट्टों से बना उस पर खूबसूरत हैंडल जड़ा हो या लोहे का कुंडा वह दरवाज़ा  ऐसे घर का हो जहाँ माँ बाप

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हाथों के दिन आयेंगे

हाथों के दिन आएँगे। कब आएँगे, यह तो कोई नहीं बताता। करने वाले जहाँ कहीं भी देखा अब तक डरने वाले मिलते हैं। सुख की रोटी कब खाएँगे, सुख से कब सोएँगे,

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हिजड़े

ये अभी अभी एक घर से बाहर निकले हैं टूट गए रंगीन गुच्छे की तरह काजल लिपस्टिक और सस्ती खुशबुओं का एक सोता फूट पड़ा है एक औरत होने के लिए कपड़े

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तब तुम क्या करोगे

यदि तुम्हें, धकेलकर गांव से बाहर कर दिया जाए पानी तक न लेने दिया जाए कुएँ से दुत्कारा फटकारा जाए चिल-चिलाती दोपहर में कहा जाए तोड़ने को पत्थर काम के बदले दिया

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मुस्कुराती रही कामना

तुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे, जगमगाती रही कल्पना रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना चाँद घूँघट घटा का उठाता रहा द्वार घर का पवन खटखटाता रहा पास आते

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मैं कहीं और भी होता हूँ

मैं कहीं और भी होता हूँ जब कविता लिखता हूँ कुछ भी करते हुए कहीं और भी होना धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है हर वक्त बस वहीं होना जहाँ कुछ कर

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कई बार

एक जीना जग जाहिर एक जीना चुपचाप दो-दो प्रकार से जीना पड़ता है एक जीवन कई बार अकस्‍मात एक दिन खत्‍म होने से पहले अँजुली भर पानी में सिकुड़ते आकाश की तड़प

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हर तरफ धुआँ है

हर तरफ धुआँ है हर तरफ कुहासा है जो दाँतों और दलदलों का दलाल है वही देशभक्त है अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है – तटस्थता यहाँ कायरता के चेहरे पर

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