छतों पर लड़कियाँ

अब भी छतों पर आती हैं लड़कियाँ मेरी ज़िन्दगी पर पड़ती हैं उनकी परछाइयाँ। गो कि लड़कियाँ आयी हैं उन लड़कों के लिए जो नीचे गलियों में ताश खेल रहे हैं नाले

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हार की जीत

नहीं, मुझे अपनी परवाह नहीं परवाह नहीं हारें कि जीतें हारते तो रहे ही हैं शुरू से लेकिन हार कर भी माथा उठ रहा और आत्मा रही जयी यवांकुर-सी हर बार सो,

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खोया हरा सुग्गा

जैसे हाथ से दमड़ी खो जाती है जैसे खेलते वक्त निशाना मारने पर कभी-कभी टन्ना खो जाता है जैसे अंगुलियों से रेंड़ी छूट जाती है जैसे देखते ही देखते हवा में उड़

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मेरे काम की नहीं

बहुत उम्मीद थी कि लौटते ही ढेर सारे बंद लिफाफे गेट पर लगे बक्से में बेतरतीब पड़े मिलेंगे। स्वीच ऑफ बताता फोन अपनी जद में पहुंचते ही मिसकॉल, अनरीड मेसेज की सूचनाएं

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समय की शिला पर

समय की शिला पर मधुर चित्र कितने किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए। किसी ने लिखी आँसुओं से कहानी किसी ने पढ़ा किन्तु दो बूँद पानी इसी में गए बीत दिन ज़िन्दगी

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कोड

भाषा को उलट कर बरतना चाहिए मैं उन्हें नहीं जानता यानी मैं उन्हें बख़ूबी जानता हूं वे बहुत बड़े और महान् लोग हैं यानी वे बहुत ओछे, पिद्दी और निकृष्ट कोटि के

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मैं देव न हो सकूँगा

  सुनो, व्यर्थ गई तुम्हारी आराधना! अर्घ्य से भला पत्थर नम हो सके कभी? बजबजाती नालियों में पवित्र जल सड़ गया आखिर! मैं देव न हुआ! सुनो, प्रेम पानी जैसा है तुम्हारे

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तुम्हारे भीतर

एक स्त्री के कारण तुम्हें मिल गया एक कोना तुम्हारा भी हुआ इंतज़ार एक स्त्री के कारण तुम्हें दिखा आकाश और उसमें उड़ता चिड़ियों का संसार एक स्त्री के कारण तुम बार-बार

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जीवन वृत्तांत

उठाया ही था पहला कौर कि पगहा तुड़ाकर भैंस भागी कहीं और पहुंचा ही था खेत में पानी कि छप्पर में आग लगी, बिटिया चिल्लानी आरंभ ही किया था गीत का बोल

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कहाँ से

तुमने पूछा – कविता कहाँ से आती है? काले कोलतार से आती है क़मीज़ के उस हिस्से से जो पतलून के भीतर है एक पैर की चप्पल के अकेलेपन से आती है

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