बबूल

बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय?’ जिसने पहली-पहली बार ऐसा कहा होगा, उसका मन फलों के राजा के रस से आप्लावित रहा होगा। रहना भी चाहिए। वह कौन है, जिसे

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पहला सफ़ेद बाल

आज पहला सफ़ेद बाल  दिखा। कान के पास काले बालों के बीच से झाँकते इस पतले रजत-तार ने सहसा मन को झकझोर दिया। ऐसा लगा, जैसे वसन्त में वनश्री देखता घूम रहा

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क्या भूलूँ क्या याद करूँ

मेरी विगत स्मृतियों, मेरे पूर्व इतिहास, मेरे वर्तमान के श्रम-संघर्ष को जैसा उसने जाना था, जैसी मेरी स्थिति की निकट भविष्य में, कम से कम अपने जीवन-काल में उसने कल्पना की थी,

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आपने मेरी रचना पढ़ी?

हमारे साहित्यिकों की भारी विशेषता यह है कि जिसे देखो वहीं गम्भीर बना है, गम्भीर तत्ववाद पर बहस कर रहा है और जो कुछ भी वह लिखता है, उसके विषय में निश्चित

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जीते रहो और किसी न किसी पर मरते रहो!

(एक ख़त जॉन एलिया का अनवर मक़सूद के नाम) अन्नो जानी ! तुम्हारा ख़त मिला। पाकिस्तान के हालात पढ़ कर कोई ख़ास परेशानी नहीं हुई। यहां भी इसी क़िस्म के हालात चल

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तीसरे दर्ज़े के श्रद्धेय

बुद्धिजीवी बहुत थोड़े में संतुष्ट हो जाता है। उसे पहले दर्ज़े का किराया दे दो ताकि वह तीसरे में सफर करके पैसा बचा ले। एकाध माला पहना दो, कुछ श्रोता दे दो

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धोखा

इन दो अक्षरों में भी न जाने कितनी शक्ति है कि इनकी लपेट से बचना यदि निरा असंभव न हो तो भी महा कठिन तो अवश्य है। जबकि भगवान रामचंद्र ने मारीच

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आलोचना

‘लेखक विद्वान हो न हो, आलोचक सदैव विद्वान होता है। विद्वान प्रायः भौंडी बेतुकी बात कह बैठता है। ऐसी बातों से साहित्य में स्थापनाएँ होती हैं। उस स्थापना की सड़ांध से वातावरण

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कलम का सिपाही

आँखों के आगे से रहे-सहे पर्दे भी गिरते जा रहे हैं। समष्टि का आदर्श जो अब तक केवल एक भावना थी, अब उसे बुद्धि का पक्का आधार मिल रहा है। ‘राष्ट्रीयता और

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