औरत बनने से पहले एक दिन

औरत बनने से पहले (हालाँकि सत्रह की है) बैठी है कमरे में परीक्षा दे रही है तनाव से उसके गाल फूले हैं और अधिक गर्दन की त्वचा है महकती सी यह लड़की

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प्रेम के लिए जगह

उसने अपने प्रेम के लिए जगह बनाई। बुहार कर अलग कर दिया तारों को सूर्य-चन्द्रमा को रख दिया एक तरफ वनलताओं को हटाया उसने पृथ्वी को झाड़ा-पोंछा और आकाश की तहें ठीक

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शून्य

भीतर जो शून्य है उसका एक जबड़ा है जबड़े में मांस काट खाने के दाँत हैं; उनको खा जाएँगे, तुमको खा जाएँगे। भीतर का आदतन क्रोधी अभाव वह हमारा स्वभाव है, जबड़े

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साहब का बाबा

चपरासी ने अदब से परदा उठा कर गोल कमरे में मेरा प्रवेश करा दिया। मैं सोफे पर बैठ गया तो उस कमरे में पहुँचाने के एहसान का बदला पाने की गरज से

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मरने से पहले

मरने से एक दिन पहले तक उसे अपनी मौत का कोई पूर्वाभास नहीं था। हाँ, थोड़ी खीझ और थकान थी, पर फिर भी वह अपनी जमीन के टुकड़े को लेकर तरह-तरह की

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सिक्का बदल गया

खद्दर की चादर ओढ़े, हाथ में माला लिए शाहनी जब दरिया के किनारे पहुंची तो पौ फट रही थी। दूर-दूर आसमान के परदे पर लालिमा फैलती जा रही थी। शाहनी ने कपड़े

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इश्क़ का रोग

इश्क़ का रोग तो विर्से में मिला था मुझको दिल धड़कता हुआ सीने में मिला था मुझ को। हाँ ये काफ़िर उसी हुजरे में मिला था मुझको एक मोमिन जहाँ सज्दे में

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घर

जहाँ बिल्ली को खदेड़ता दिख जाएगा खरगोश वहीं अपना घर बनाऊँगा वहीं शीत वसंत लाऊँगा वहीं लगाऊँगा सेब, नारंगी संतरा वहीं कामधेनु पोसूँगा वहीं कवियों, बुलाऊँगा तुम्हें और काव्य पाठ कराऊँगा जहाँ

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पिता का चश्मा

बुढ़ापे के समय पिता के चश्मे एक-एक कर बेकार होते गए आँख के कई डॉक्टरों को दिखाया विशेषज्ञों के पास गए अन्त में सबने कहा — आपकी आँखों का अब कोई इलाज

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घर में ठंडे चूल्हे पर

घर में ठन्डे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है बगावत के कमल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में मैं जब भी देखता

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