ग़ज़ाला तबस्सुम की ग़ज़लें

1. फिर नफ़रतों ने इश्क़ की मीनार तोड़ दी दरवाज़ा जब न टूटा तो दीवार तोड़ दी फूलों से उसको प्यार है तोड़ा नहीं उन्हें उसने कली मेरे लिए इक बार तोड़

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कुमार विजय गुप्त की कविताएँ

1. झूठ-मूठ हरेक झूठ की एक मूठ होती है जिसे मजबूती से पकड़े रहता है झूठ जिधर भी जाता साथ लिए चलता है जैसे हत्यारा हर वक्त साथ रखता है अपना प्रिय हथियार

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नवनीत शर्मा की ग़ज़लें

1. मेरा दुश्‍मन मेरे अंदर से उभर आया है मेरा साया ही मुझे ग़ैर नज़र आया है इश्क़ में सर भी झुका और अना भी डूबी ओखली झूम के नाची है कि

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विनय सौरभ की कविताएँ

1. पिता की कमीज़ पिता की कमीज़ खूंटी पर टंगी है बरसों से पसीने से भीगी और पहाड़ों की तरफ से हवा लगातार कमरे में आ रही है पिता बरसों से इस

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आँकड़ों की बीमारी

एक बार मुझे आँकड़ों की उल्टियाँ होने लगीं गिनते गिनते जब संख्या करोड़ों को पार करने लगी मैं बेहोश हो गया होश आया तो मैं अस्पताल में था खून चढ़ाया जा रहा

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अपनी मंज़िल से जा लगा कोई

अपनी मंज़िल से जा लगा कोई अब न देखेगा रास्ता कोई सूनी–सूनी सी रहगुज़र क्यूँ है आज गुज़रा न क़ाफ़िला कोई आज पत्थर उदास बैठे हैं आज टूटा है आइना कोई ख़ुशबूऐं आ

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राजनीतिज्ञ

विचलन तो दूर की बात है डर की एक लौ भी नहीं छूती उन्हें उन्होंने पढ़ रखी है गीता वे मार सकते हैं स्वजनों को वे जानते हैं तुम्हें कि तुम लाचार

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कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया

कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया और कुछ तल्ख़ी-ए-हालात ने दिल तोड़ दिया हम तो समझे थे के बरसात में बरसेगी शराब आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया

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