एक मुर्दे का बयान

मैं एक अदृश्य दुनिया में, न जाने क्या कुछ कर रहा हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है- न मेरी कविताएँ हैं, न मेरे पाठक हैं न मेरा अधिकार है यहाँ तक

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असंबद्ध

कितनी ही पीड़ाएँ हैं जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं ऐसी भी होती है स्थिरता जो हूबहू किसी दृश्य में बंधती नहीं ओस से निकलती है सुबह मन को गीला करने की जि़म्मेदारी

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तेरे आने की जब ख़बर महके

तेरे आने की जब ख़बर महके तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके शाम महके तेरे तसव्वुर से शाम के बाद फिर सहर महके रात भर सोचता रहा तुझको ज़हन-ओ-दिल मेरे रात भर

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आज मैं अकेला हूँ

(1) आज मैं अकेला हूँ अकेले रहा नहीं जाता। (2) जीवन मिला है यह रतन मिला है यह धूल में कि फूल में मिला है तो मिला है यह मोल-तोल इसका अकेले

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तुमसे अलग हो कर

तुमसे अलग होकर लगता है अचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं, और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में गिरता जा रहा हूँ। अब कहीं कोई यात्रा नहीं है, न अर्थमय, न

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मुसलमान

कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले वे व्याधि थे ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे वे मुसलमान थे उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे

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मैं उनका ही होता

मैं उनका ही होता जिनसे मैंने रूप भाव पाए हैं। वे मेरे ही हिये बंधे हैं जो मर्यादाएँ लाए हैं। मेरे शब्द, भाव उनके हैं मेरे पैर और पथ मेरा, मेरा अंत

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कविता ही दुख की बोली है

मुझको तब भी यह लगता था कविता ही दुख की बोली है काग़ज़ की नावों के जैसे यद्यपि छोटे-छोटे सुख थे, दुख का भवसागर अपार था लेकिन थी एक जगह घर में

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ट्राम में एक याद

चेतना पारीक कैसी हो ? पहले जैसी हो ? कुछ-कुछ खुश कुछ-कुछ उदास कभी देखती तारे कभी देखती घास चेतना पारीक, कैसी दिखती हो ? अब भी कविता लिखती हो ? तुम्हें मेरी याद न होगी

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