नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ मुझे ऊँचाइयों का वह अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा
लोग मुझे कवि कहते हैं, और गलती करते हैं; मैं अपने को कवि समझता था और गलती करता था। मुझे अपनी गलती मालूम हुई मियाँ राहत से मिलकर, और लोगों को उनकी
Moreमुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद अपने ख़्वाबों के जज़ीरों
More“सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं ख़त ग़ैर का पढ़ते थे जो टोका तो वो बोले अख़बार का पर्चा है ख़बर
Moreलिखने से ही लिखी जाती है कविता प्रेम भी करने की ही चीज़ है जैसे जंगल सुनने की किताब डूबने की मृत्यु इंतज़ार की जीवन, अपने को चारों ओर से समेट कर
More1. झाझ और प्रेमिका मन के भीतर आती गयी तुम, जैसे आता है गोंद पेड़ों पर, प्रेम भर जाये तो बरस पड़ता है, शरीर के तनों पर! … तुम आयी! आकाश सकुचाया,
More1. किसने तय किया किसी कविता का कविता होना ताल लय छंद से परे किसी के रोने में सौन्दर्य किसी के हंसने में संगीत किसने तय किया ये पहाड़ है, ये नदी
Moreहम सब तो खड़े हैं मक़तल में क्या हमको ख़बर इस बात की है जिस जुल्म को हम सौग़ात कहें सौग़ात वो काली रात की है हम जिसको मसीहा कह बैठे वो
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