एक कम है

अब एक कम है तो एक की आवाज कम है एक का अस्तित्व एक का प्रकाश एक का विरोध एक का उठा हुआ हाथ कम है उसके मौसमों के वसंत कम हैं

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शून्य

भीतर जो शून्य है उसका एक जबड़ा है जबड़े में मांस काट खाने के दाँत हैं; उनको खा जाएँगे, तुमको खा जाएँगे। भीतर का आदतन क्रोधी अभाव वह हमारा स्वभाव है, जबड़े

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मुस्कुराती रही कामना

तुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे, जगमगाती रही कल्पना रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना चाँद घूँघट घटा का उठाता रहा द्वार घर का पवन खटखटाता रहा पास आते

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मैं कहीं और भी होता हूँ

मैं कहीं और भी होता हूँ जब कविता लिखता हूँ कुछ भी करते हुए कहीं और भी होना धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है हर वक्त बस वहीं होना जहाँ कुछ कर

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कई बार

एक जीना जग जाहिर एक जीना चुपचाप दो-दो प्रकार से जीना पड़ता है एक जीवन कई बार अकस्‍मात एक दिन खत्‍म होने से पहले अँजुली भर पानी में सिकुड़ते आकाश की तड़प

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हर तरफ धुआँ है

हर तरफ धुआँ है हर तरफ कुहासा है जो दाँतों और दलदलों का दलाल है वही देशभक्त है अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है – तटस्थता यहाँ कायरता के चेहरे पर

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एक पारिवारिक प्रश्न

छोटे से आंगन में माँ ने लगाए हैं तुलसी के बिरवे दो पिता ने उगाया है बरगद छतनार मैं अपना नन्हा गुलाब कहाँ रोप दूँ! मुट्ठी में प्रश्न लिए दौड़ रहा हूं

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कोई अधूरा पूरा नहीं होता

कोई अधूरा पूरा नहीं होता और एक नया शुरू होकर नया अधूरा छूट जाता शुरू से इतने सारे कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते परंतु इस असमाप्त – अधूरे से

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स्त्री के बारे में

किसी अँधेरे कमरे में सीलन भरे कोने की ठंडी दीवार से बात करते हुए जो स्त्री रो रही है क्या कोई उस स्त्री के बारे में जानता है? जो उसके बारे में

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उधर के चोर

उधर के चोर भी अजीब हैं लूट और डकैती के अजीबो-गरीब किस्से – कहते हैं ट्रेन-डकैती सात बजते-बजते संपन्न हो जाती है क्योंकि डकैतों को जल्दी सोने की आदत है और चूँकि

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