रोटी और संसद

एक आदमी रोटी बेलता है एक आदमी रोटी खाता है एक तीसरा आदमी भी है जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है मैं पूछता

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तटस्थ के प्रति

चैन की बाँसुरी बजाइये आप शहर जलता है और गाइये आप हैं तटस्थ या कि आप नीरो हैं असली सूरत ज़रा दिखाइये आप

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ऊँचाई है कि

मैं वह ऊँचा नहीं जो मात्र ऊँचाई पर होता है कवि हूँ और पतन के अंतिम बिंदु तक पीछा करता हूँ हर ऊँचाई पर दबी दिखती है मुझे ऊँचाई की पूँछ लगता

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परिणति

उस दिन भी ऐसी ही रात थी। ऐसी ही चांदनी थी। उस दिन भी ऐसे ही अकस्मात्, हम-तुम मिल गए थे। उस दिन भी इसी पार्क की इसी बेंच पर बैठ कर,

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उँगलियों के पोरों पर दिन गिनती

उँगलियों पर गिन रही है दिन खाँटी घरेलू औरत सोनू और मुनिया पूछते हैं ‘क्या मिलाती रहती हो मां उँगलियों की पोरों पर’ वह कहती है ‘तुम्हारे मामा की शादी का दिन

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उड़ानें

कवि मरते हैं जैसे पक्षी मरते हैं गोधूलि में ओझल होते हुए ! सिर्फ़ उड़ानें बची रह जाती हैं दुनिया में आते ही क्यों हैं जहाँ इन्तज़ार बहुत और साथ कम स्त्रियाँ जब

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समझदारों का गीत

हवा का रुख कैसा है, हम समझते हैं हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं, हम समझते हैं हम समझते हैं खून का मतलब पैसे की कीमत हम समझते हैं क्या है

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कुमार विजय गुप्त की कविताएँ

1. झूठ-मूठ हरेक झूठ की एक मूठ होती है जिसे मजबूती से पकड़े रहता है झूठ जिधर भी जाता साथ लिए चलता है जैसे हत्यारा हर वक्त साथ रखता है अपना प्रिय हथियार

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विनय सौरभ की कविताएँ

1. पिता की कमीज़ पिता की कमीज़ खूंटी पर टंगी है बरसों से पसीने से भीगी और पहाड़ों की तरफ से हवा लगातार कमरे में आ रही है पिता बरसों से इस

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