आँसू बाँधे हैं मैंने

आँसू बाँधे मैंने गठरिया में … अपने भी हैं और पराए भी हैं ये उपराए हैं तो तराए भी हैं ये आप आ गये हैं बराए भी हैं ये साधे हैं मैंने

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आषाढ़ का एक दिन

पात्र परिचय अंबिका : ग्राम की एक वृद्धा मल्लिका : वृद्धा की पुत्री कालिदास : कवि दंतुल : राजपुरुष मातुल : कवि मातुल निक्षेप : ग्राम-पुरुष विलोम : ग्राम-पुरुष रंगिणी : नागरी

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आपकी याद आती रही रात भर

आप की याद आती रही रात भर चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर रात भर दर्द की शम्अ जलती रही ग़म की लौ थरथराती रही रात भर बाँसुरी की सुरीली सुहानी सदा याद

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तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं मैं बे-पनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं तिरी ज़बान

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एक लोक गीत की अनुकृति

(जो मैंने मंगल माँझी से सुना था) आम की सोर पर मत करना वार नहीं तो महुआ रात भर रोएगा जंगल में कच्चा बांस कभी काटना मत नहीं तो सारी बांसुरियाँ हो

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सोने से पहले

हर लड़की के तकिए के नीचे तेज़ ब्लेड गोंद की शीशी और कुछ तस्वीरें होती हैं सोने से पहले वो कई तस्वीरों की तराश-ख़राश से एक तस्वीर बनाती है किसी की आँखें

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मैं फिर भी बढ़ती जाती हूँ

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चाहे मुझे इतिहास में निचला दर्जा दो अपने कटु, विकृत झूठ के साथ, भले ही कीचड़ में सान दो फिर भी, धूल की तरह, मैं उठ जाऊँगी मेरी जिंदादिली से परेशान हो

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एक मुर्दे का बयान

मैं एक अदृश्य दुनिया में, न जाने क्या कुछ कर रहा हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है- न मेरी कविताएँ हैं, न मेरे पाठक हैं न मेरा अधिकार है यहाँ तक

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असंबद्ध

कितनी ही पीड़ाएँ हैं जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं ऐसी भी होती है स्थिरता जो हूबहू किसी दृश्य में बंधती नहीं ओस से निकलती है सुबह मन को गीला करने की जि़म्मेदारी

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तेरे आने की जब ख़बर महके

तेरे आने की जब ख़बर महके तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके शाम महके तेरे तसव्वुर से शाम के बाद फिर सहर महके रात भर सोचता रहा तुझको ज़हन-ओ-दिल मेरे रात भर

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