कोई उम्मीद बर नहीं आती

कोई उम्मीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यूँ रात भर नहीं आती आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी अब किसी बात पर

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प्रतीक्षा

प्रतीक्षा धूप में चिड़ियों का स्पन्दन है, हरी पत्तियों का नीरव उजला गान है, प्रतीक्षा दरवाजे पर दस्तक के अनसुने रहने पर छोड़े गए शब्द हैं

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पच्चीस चौका डेढ़ सौ

पहली तनख्वाह के रुपये हाथ में थामे सुदीप अभावों के गहरे अंधकार में रोशनी की उम्मीद से भर गया था। एक ऐसी खुशी उसके जिस्म में दिखाई पड़ रही थी, जिसे पाने

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वापसी

गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नजर दौड़ाई – दो बक्से, डोलची, बालटी – ‘यह डिब्‍बा कैसा है, गनेशी?’ उन्‍होंने पूछा। गनेशी बिस्‍तर बाँधता हुआ, कुछ गर्व, कुछ दुख,

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इस हमाम में

आज उसकी घंटी नहीं बजी, न ही आवाज़ सुनाई दी। रोज सुबह दरवाज़े के बाहर से उसकी आवाज़ सुनाई पड़ती – ‘बाई, कचरा!’ इसी तर्ज़ में वह यानी अंजा हमारे लम्बे कॉरीडोर

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आपकी याद आती रही रातभर

आपकी याद आती रही रात भर चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई शम्म’ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन कोई तस्वीर गाती रही

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कर्ज़ उतर जाता है एहसान नहीं उतरता

यहाँ (बंबई में) कई दोस्त मिले जिनके साथ अच्छी-बुरी गुजरी। कृष्ण चंदर, भारती, कमलेश्वर, जो शुरू ही में ये न मिल गए होते तो बंबई में मेरा रहना असंभव हो जाता। शुरू

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भूल पाने की लड़ाई

उसे भूलने की लड़ाई लड़ता रहता हूँ यह लड़ाई भी दूसरी कठिन लड़ाइयों जैसी है दुर्गम पथ जाते हैं उस ओर उसके साथ गुजारे दिनों के भीतर से उठती आती है जो

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अश्लील

शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अख़बारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।

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