उपक्रम

बुझी हुई रातों की करवटों में ऊंघते अनमने ढंग से सन्नाटे और अंधेरे में मैंने बो रखी हैं कुछ तस्वीरें कुछ मोह-पाश जो तेज झंझावात में पानी की तरह बह निकलते हैं

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लेकिन बड़ी देर हो चुकी थी

इस उम्र के बाद उस को देखा! आँखों में सवाल थे हज़ारों होंटों पे मगर वही तबस्सुम! चेहरे पे लिखी हुई उदासी लहजे में मगर बला का ठहराओ आवाज़ में गूँजती जुदाई

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दुनिया

हिलती हुई मुँडेरें हैं और चटखे हुए हैं पुल बररे हुए दरवाज़े हैं और धँसते हुए चबूतरे दुनिया एक चुरमुरायी हुई-सी चीज़ हो गई है दुनिया एक पपड़ियायी हुई-सी चीज़ हो गई

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रक़ीब से

जब फैज़ सियालकोट में रह रहे  थे, तो उनके घर के ठीक सामने एक लड़की रहती थी, जिनसे फैज़ को मोहब्बत थी। एक दिन, कॉलेज से लौटने के बाद, फैज़ ने पाया

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परियों की बातें

मैं अपने दोस्त के पास बैठा था। उस वक़्त मेरे दिमाग़ में सुक़्रात का एक ख़याल चक्कर लगा रहा था— क़ुदरत ने हमें दो कान दिये हैं और दो आंखें मगर ज़बान

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ऐ काल, न तू इतरा

ऐ काल, न तू इतरा, भले ही बोल रहे कुछ, बली-भयंकर तुझको, पर इन पदों से तू च्युत। और, वो, जिनको तुम समझ रहे, तुमने मारा है, मरे नहीं, मैं भी अपार,

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अपने दुख मुझे दे दो

शादी की रात बिल्कुल वह न हुआ जो मदन ने सोचा था। जब चकली भाभी ने फुसला कर मदन को बीच वाले कमरे में धकेल दिया तो इंदू सामने शाल में लिपटी

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कविता की जरुरत

बहुत कुछ दे सकती है कविता क्यों कि बहुत कुछ हो सकती है कविता ज़िन्दगी में अगर हम जगह दें उसे जैसे फलों को जगह देते हैं पेड़ जैसे तारों को जगह

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भली सी एक शक्ल थी

भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो

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