बुझी हुई रातों की करवटों में ऊंघते अनमने ढंग से सन्नाटे और अंधेरे में मैंने बो रखी हैं कुछ तस्वीरें कुछ मोह-पाश जो तेज झंझावात में पानी की तरह बह निकलते हैं
Moreइस उम्र के बाद उस को देखा! आँखों में सवाल थे हज़ारों होंटों पे मगर वही तबस्सुम! चेहरे पे लिखी हुई उदासी लहजे में मगर बला का ठहराओ आवाज़ में गूँजती जुदाई
Moreमैं अपने दोस्त के पास बैठा था। उस वक़्त मेरे दिमाग़ में सुक़्रात का एक ख़याल चक्कर लगा रहा था— क़ुदरत ने हमें दो कान दिये हैं और दो आंखें मगर ज़बान
Moreअब कभी मिलना नहीं होगा ऐसा था और हम मिल गए दो बार ऐसा हुआ पहले पन्द्रह बरस बाद मिले फिर उसके आठ बरस बाद जीवन इसी तरह का जैसे स्थगित मृत्यु
Moreऐ काल, न तू इतरा, भले ही बोल रहे कुछ, बली-भयंकर तुझको, पर इन पदों से तू च्युत। और, वो, जिनको तुम समझ रहे, तुमने मारा है, मरे नहीं, मैं भी अपार,
Moreशादी की रात बिल्कुल वह न हुआ जो मदन ने सोचा था। जब चकली भाभी ने फुसला कर मदन को बीच वाले कमरे में धकेल दिया तो इंदू सामने शाल में लिपटी
Moreबहुत कुछ दे सकती है कविता क्यों कि बहुत कुछ हो सकती है कविता ज़िन्दगी में अगर हम जगह दें उसे जैसे फलों को जगह देते हैं पेड़ जैसे तारों को जगह
Moreभले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो
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