एक बात और

मैक्सीन — एल.डी की पत्नी — जब काम से घर लौटी तो उसने पाया एल.डी किचन टेबल पर अपनी पंद्रह वर्षीय बेटी रे से बहस कर रहा है. बहस करते हुए वह

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ग़ुलामी की अंतिम हदों तक लड़ेंगे

इस ज़माने में जिनका ज़माना है भाई उन्हीं के ज़माने में रहते हैं हम उन्हीं की हैं सहते, उन्हीं की हैं कहते उन्हीं की ख़ातिर दिन-रात बहते हैं हम ये उन्हीं का

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हम सब तो खड़े हैं मक़तल में

हम सब तो खड़े हैं मक़तल में क्या हमको ख़बर इस बात की है जिस जुल्म को हम सौग़ात कहें सौग़ात वो काली रात की है हम जिसको मसीहा कह बैठे वो

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लयबद्ध

सबको तो रोशनी नहीं मिलती समझौता कर लो अँधियारे से हर भटके राही को सिर्फ़ यही उत्तर एक मिला ध्रुवतारे से। ज़्यादातर सुंदर ही होते हैं फूलों के बारे में यह सच

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लौटना

तुमने कहा जाती हूँ और तुमने सोचा कि कवि-केदार की तरह मैं कहूँगा जाओ लेकिन मेरी लोक-भाषा के पास अपने बिंब थे मेरी भाषा में जब भी कोई जाता था तो ‘आता

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मातृभाषा की मौत

माँ के मुँह में ही मातृभाषा को क़ैद कर दिया गया और बच्चे उसकी रिहाई की माँग करते-करते बड़े हो गए। मातृभाषा ख़ुद नहीं मरी थी उसे मारा गया था पर, माँ

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चंदू, मैंने सपना देखा

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू चंदू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में

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