रेख़्ते में कविता

जैसे कोई हुनरमंद आज भी घोड़े की नाल बनाता दिख जाता है ऊँट की खाल की मशक में जैसे कोई भिश्‍ती आज भी पिलाता है जामा मस्जिद और चांदनी चौक में प्‍यासों

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तुम सरवत को पढ़ती हो

तुम सरवत को पढ़ती हो कितनी अच्छी लड़की हो बात नहीं सुनती हो क्यूँ ग़ज़लें भी तो सुनती हो क्या रिश्ता है शामों से सूरज की क्या लगती हो लोग नहीं डरते रब

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हीर सुफ़ियां

हीर सुफ़ियां है एक सुन्दर लड़की हीर सुफ़ियां के हैं उनतीस दांत हीर सुफ़ियां मुस्काती है तो लाल किले की लाल दीवार और सुर्ख़ हो जाती है चांदनी चौक में रहती है

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संघर्ष साझे नहीं होते

जीवन के संघर्ष साझा नहीं होते साझा होती है सहानुभूतियाँ साझा होती हैं प्रार्थनाएँ साझा होते हैं स्नेह आलिंगन साझा होती है आँसू पोंछने वाली हथेलियाँ साझा होती है हाथों की फँसी

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आए हैं समझाने लोग

आए हैं समझाने लोग हैं कितने दीवाने लोग वक़्त पे काम नहीं आते हैं ये जाने-पहचाने लोग जैसे हम इन में पीते हैं लाए हैं पैमाने लोग फ़र्ज़ानों से क्या बन आए

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काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में

काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत इतना असर है खादी के उजले लिबास में आज़ादी का ये जश्न

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पुरखों का कहन

उनकी कविताओं में शब्द नहीं बोलते उनके बनाए चित्रों में रंग नहीं बहकते उनकी कहानियों में तख़्त-ओ-ताज के लिए ख़ून नहीं बहता फिर भी वे कविता करते हैं चित्र बनाते हैं कहानियाँ

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न रवा कहिए न सज़ा कहिए

न रवा कहिये न सज़ा कहिये कहिये कहिये मुझे बुरा कहिये दिल में रखने की बात है ग़म-ए-इश्क़ इस को हर्गिज़ न बर्मला कहिये वो मुझे क़त्ल कर के कहते हैं मानता

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कथा देश की

ढंगों और दंगों के इस महादेश में ढंग के नाम पर दंगे ही रह गये हैं। और दंगों के नाम पर लाल खून, जो जमने पर काला पड़ जाता है। यह हादसा

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