इस दौर में

हत्यारे और भी नफ़ीस होते जाते हैं मारे जाने वाले और भी दयनीय वह युग नहीं रहा जब बन्दी कहता था वैसा ही सुलूक़ करो मेरे साथ जैसा करता है राजा दूसरे

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एक पारिवारिक प्रश्न

छोटे से आंगन में माँ ने लगाए हैं तुलसी के बिरवे दो पिता ने उगाया है बरगद छतनार मैं अपना नन्हा गुलाब कहाँ रोप दूँ! मुट्ठी में प्रश्न लिए दौड़ रहा हूं

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कोई अधूरा पूरा नहीं होता

कोई अधूरा पूरा नहीं होता और एक नया शुरू होकर नया अधूरा छूट जाता शुरू से इतने सारे कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते परंतु इस असमाप्त – अधूरे से

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धूप कोठरी के आईने में खड़ी

धूप कोठरी के आइने में खड़ी हँस रही है पारदर्शी धूप के पर्दे मुस्कराते मौन आँगन में मोम-सा पीला बहुत कोमल नभ एक मधुमक्खी हिलाकर फूल को बहुत नन्हा फूल उड़ गई

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आप उसे फ़ोन करें

आप उसे फ़ोन करें तो कोई ज़रूरी नहीं कि उसका फ़ोन खाली हो हो सकता है उस वक़्त वह चांद से बतिया रही हो या तारों को फ़ोन लगा रही हो वह

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संध्या के संग लौट आना तुम

जाओ, पर संध्‍या के संग लौट आना तुम, चाँद की किरन निहारते न बीत जाय रात। कैसे बतलाऊँ, इस अँधियारी कुटिया में कितना सूनापन है, कैसे समझाऊँ, इन हलकी-सी साँसों का कितना

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स्त्री के बारे में

किसी अँधेरे कमरे में सीलन भरे कोने की ठंडी दीवार से बात करते हुए जो स्त्री रो रही है क्या कोई उस स्त्री के बारे में जानता है? जो उसके बारे में

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उधर के चोर

उधर के चोर भी अजीब हैं लूट और डकैती के अजीबो-गरीब किस्से – कहते हैं ट्रेन-डकैती सात बजते-बजते संपन्न हो जाती है क्योंकि डकैतों को जल्दी सोने की आदत है और चूँकि

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प्रतीक्षा

प्रतीक्षा धूप में चिड़ियों का स्पन्दन है, हरी पत्तियों का नीरव उजला गान है, प्रतीक्षा दरवाजे पर दस्तक के अनसुने रहने पर छोड़े गए शब्द हैं

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