फिर बसंत आना है

तूफ़ानी लहरें हों अम्बर के पहरे हों पुरवा के दामन पर दाग़ बहुत गहरे हों सागर के माँझी मत मन को तू हारना जीवन के क्रम में जो खोया है, पाना है

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पूर्व प्रेमिकाएँ

मेरे बाद वे उन छातियों से भी लगकर रोई होंगी जो मेरी नहीं थीं दूसरे चुंबन भी जगे होंगे उनके होंठों पर दूसरे हाथों ने भी जगाया होगा उनकी हथेलियों को उनकी

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सोख न लेना पानी

सूरज ! सोख न लेना पानी ! तड़प तड़प कर मर जाएगी मन की मीन सयानी ! सूरज, सोख न लेना पानी ! बहती नदिया सारा जीवन साँसें जल की धारा जिस पर तैर रहा नावों-सा

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बुरी औरत के सपनों में

बुरी औरत के सपनों में नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर बुरी औरत के सपनों में नहीं होती बदन को धरती बनाकर धान कुटवाने वाली निर्जीव

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साधो ये मुरदों का गाँव

साधो ये मुरदों का गाँव पीर मरे पैगम्बर मरिहैं मरि हैं जिन्दा जोगी राजा मरिहैं परजा मरिहैं मरिहैं बैद और रोगी चंदा मरिहैं सूरज मरिहैं मरिहैं धरणि आकासा चौदां भुवन के चौधरी

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कविता के भ्रम में

क्या तुम कविता की तरफ़ जा रहे हो ? नहीं, मैं दीवार की तरफ़ जा रहा हूँ । फिर तुमने अपने घुटने और अपनी हथेलियाँ यहाँ क्यों छोड़ दी हैं ? क्या तुम्हें चाकुओं

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वसंतसेना

सीढ़ियाँ चढ़ रही है वसंतसेना अभी तुम न समझोगी वसंतसेना अभी तुम युवा हो सीढ़ियाँ समाप्त नहीं होती उन्नति की हों अथवा अवनति की आगमन की हों या प्रस्थान की अथवा अवसान

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