एक तुम्हारा होना

एक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है, बेज़ुबान छत दीवारों को घर कर देता है। ख़ाली शब्दों में आता है ऐसे अर्थ पिरोना गीत बन गया-सा लगता है घर का कोना-कोना

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अंतिम ऊँचाई

कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं, हमारे चारों ओर नहीं। कितना आसान होता चलते चले जाना यदि केवल हम चलते होते बाक़ी सब रुका

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पानी

आदमी तो आदमी मैं तो पानी के बारे में भी सोचता था कि पानी को भारत में बसना सिखाऊँगा सोचता था पानी होगा आसान पूरब जैसा पुआल के टोप जैसा मोम की

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टूटती धार

काँपती है बहुत पतली धार पानी की हवा में— कि जैसे भीड़ में खोई हुई बच्ची पिता को टेरती हो कि जैसे अनगिनत संभावनाएँ चाहकर भी फलवती होने न पाएँ टूटती है

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सुनो चारुशीला

दिवंगत पत्नी विजय के लिए  तुम अपनी दो आँखों से देखती हो एक दृश्य दो हाथों से करती हो एक काम दो पाँवों से दो रास्तों पर नहीं एक ही पर चलती

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एक बार फिर शुरू करना होगा

एक बार फिर शुरू करना होगा एक बार फिर ज़मीन जोतनी होगी बीजों का, खाद का चुनाव करना होगा एक बार फिर पत्थरों को काट कर नहर लानी होगी धूप-झुलसी धरती तक

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आँसू बाँधे हैं मैंने

आँसू बाँधे मैंने गठरिया में … अपने भी हैं और पराए भी हैं ये उपराए हैं तो तराए भी हैं ये आप आ गये हैं बराए भी हैं ये साधे हैं मैंने

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एक लोक गीत की अनुकृति

(जो मैंने मंगल माँझी से सुना था) आम की सोर पर मत करना वार नहीं तो महुआ रात भर रोएगा जंगल में कच्चा बांस कभी काटना मत नहीं तो सारी बांसुरियाँ हो

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मैं फिर भी बढ़ती जाती हूँ

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चाहे मुझे इतिहास में निचला दर्जा दो अपने कटु, विकृत झूठ के साथ, भले ही कीचड़ में सान दो फिर भी, धूल की तरह, मैं उठ जाऊँगी मेरी जिंदादिली से परेशान हो

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एक मुर्दे का बयान

मैं एक अदृश्य दुनिया में, न जाने क्या कुछ कर रहा हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है- न मेरी कविताएँ हैं, न मेरे पाठक हैं न मेरा अधिकार है यहाँ तक

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