ठेले पर हिमालय

ठेले पर हिमालय’ – खासा दिलचस्‍प शीर्षक है न। और यकीन कीजिए, इसे बिलकुल ढूँढ़ना नहीं पड़ा। बैठे-बिठाए मिल गया। अभी कल की बात है, एक पान की दूकान पर मैं अपने

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सुलगती टहनी

प्रयाग : 1976 मुँह अँधेरे सीटी सुनाई देती है-घनी नींद में सुराख बनाती हुई-एक क्षण पता नहीं चलता, मैं कहाँ हूँ, किस जगह हूँ, कौन-सा समय है? आँखें खुलती हैं, तो ढेस-सा

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दिनकर की काव्य चेतना

दिनकर राष्ट्रीय भाव धारा के प्रमुख कवि हैं। इस प्रसंग में ध्यान देने की बात यह कि राष्ट्रीय भाव धारा में कई अंतर्धाराएँ हैं, जैसे राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम की कई धाराएँ हैं।

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रीतिकाल – मिथक और यथार्थ

मध्यकाल जिसे कहते हैं उसको दो संदर्भों में देखना चाहिए। साहित्य के इतिहास का काल विभाजन प्रायः समाज के इतिहास के काल विभाजन के आधार पर ही होता है। इसमें कभी-कभी विडंबनापूर्ण

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आलोचना की संस्कृति और संस्कृति की आलोचना

यदि ”प्रच्‍छन्‍नता का उद्घाटन,” जैसा कि आचार्य शुक्‍ल आचार्य शुक्‍ल ने कहा है: ”कवि-कर्म का प्रमुख अंग है” तो आलोचना-कर्म का वह अभिन्‍न अंग है। यह प्रच्‍छन्‍नता सभ्‍यता के आवरण निर्मित करते

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मौन

स्थगित कर दूँ क्या अभी अभिव्यक्ति का आग्रह, न बोलूँ, चुप रहूँ क्या?’ क्यों? कहिए, न बोलूँ, चुप रहूँ क्या? किंतु आप कहें कि ‘धन्यवाद, चुप रहिए’ तो उससे भी क्या? आपका

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जैसा समाज होगा वैसा परिवार

हम जानते हैं कि जब समाज अपनी प्रारंभिक अवस्था में था तो परिवार की शुरुआती अवधारणाएँ और परिणतियाँ अपने मूल व्यवहार में तमाम आडंबरों से रहित थीं। उनमें खुलापन, आजादी और यायावरी

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आधुनिक कहानी की रचना संस्कृति

शहरज़ाद के नाम मेरी कहानी इन दिनों मुश्किल में है। जब लिखने बैठता हूँ तो अदबदाकर कोई वारदात गुजर जाती है। खबर मिलती है कि फुलाँ मस्जिद पर दहशतगर्दों ने हल्ला बोल

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गोडसे@गांधी.कॉम

पात्र मोहनदास करमचंद गांधी, नाथूराम गोडसे, बावनदास (फणीश्‍वर नाथ रेणु के उपन्‍यास ‘मैला आँचल’ का पात्र) सुषमा शर्मा (दिल्‍ली की एक मिडिल क्‍लास फैमिली की लड़की जिसने बी.ए. पास किया है जो

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गबरघिचोर

कथा-सार भारत से सुदूर गाँव में ऐसा होता था कि युवक शादी-गवना के बाद अपनी बेरोजगारी से घबराकर काम-धंधा करके कमाने के उद्देश्‍य से नगरों, महानगरों या औद्योगिक स्‍थलों पर चले जाते

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