लेखक

प्रात:काल महाशय प्रवीण ने बीस दफ़ा उबाली हुई चाय का प्याला तैयार किया और बिना शक्कर और दूध के पी गये। यही उनका नाश्ता था। महीनों से मीठी, दूधिया चाय न मिली

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संबंध

तुम्‍हारी देह से छूटा हुआ पहला बच्‍चा रो रहा था तुम्‍हारी देह के किनारे और तुम्‍हारी छाती से दूध छूट नहीं रहा था तुम हार गई, माँ भी और दादी और तुम्‍हें

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चुप्पा आदमी

आदमी के चुप रहने का मतलब यह तो नहीं कि उसके भीतर कोई हलचल नहीं है फिर भी उन्हें पसंद है चुप्पा आदमी चुप रहने से बाहर सब कुछ शांत रहता है

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कवि व्यभिचारी चोर

एक दिन एक कवि ने शिकायत की कि ‘आप हिंदी के लेखकों को ही क्यों ठोकते हैं? अन्य भाषाओं वाले पढ़ते होंगे, तो क्या सोचते होंगे?’ ‘न ठोकता, तो तुम क्या यह

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धरती और भार

भौजी, डोल हाथ में टाँगे मत जाओ नल पर पानी भरने तुम्हारा डोलता है पेट झूलता है अन्दर बँंधा हुआ बच्चा गली बहुत रुखड़ी है। गड़े हैं कंकड़-पत्थर दोनों हाथों से लटके

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मैं क्यों लिखता हूँ

मैं क्यों लिखता हूँ? यह एक ऐसा सवाल है कि मैं क्यों खाता हूँ… मैं क्यों पीता हूँ… लेकिन इस दृष्टि से मुख़तलिफ है कि खाने और पीने पर मुझे रुपए खर्च

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कजरी के गीत मिथ्या हैं

अगले कातिक में मैं बारह साल की हो जाती ऐसा माँ कहती थी लेकिन जेठ में ही मेरा ब्याह करा दिया गया ब्याह शब्द से डर लगता था जब से पड़ोस की

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स्त्री सुबोधिनी

प्यारी बहनों, न तो मैं कोई विचारक हूँ, न प्रचारक, न लेखक, न शिक्षक। मैं तो एक बड़ी मामूली-सी नौकरीपेशा घरेलू औरत हूँ, जो अपनी उम्र के बयालीस साल पार कर चुकी

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पलाश के फूल

नए मकान के सामने पक्की चहारदीवारी खड़ी करके जो अहाता बनाया गया है, उसमें दोनो ओर पलाश के पेड़ों पर लाल-लाल फूल छा गए थे। राय साहब अहाते का फाटक खोलकर अंदर

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हिंदी में मनहूस रहने की परम्परा

हिंदी साहित्य में गंभीर रहने पर विकट जोर है। साहित्य के स्तर से ज्यादा जोर मनहूसियत की मात्रा पर। आप अच्छा साहित्य रचें और ज्यों-ज्यों अच्छा रचते जाएँ, त्यों-त्यों और गंभीर होते

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