क़र्ज़ की पीते थे

एक जगह महफ़िल जमी थी। मिर्ज़ा ग़ालिब वहां से उकता कर उठे। बाहर हुआदार मौजूद था। उस में बैठे और अपने घर का रुख़ किया। हवादार से उतर कर जब दीवान-ख़ाने में

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तुलादान

धोबी के घर कहीं गोरा चिट्टा छोकरा पैदा हो जाए तो उस का नाम बाबू रख देते हैं। साधू राम के घर बाबू ने जन्म लिया और ये सिर्फ़ बाबू की शक्ल-ओ-सूरत

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तस्वीर, इश्क़ की खुटियाँ और जनेऊ

वे तीन वेश्याएँ थीं। वे अपना नाम और शिनाख्त़ छुपाना नहीं चाहती थीं। वैसे भी उनके पास छुपाने को कुछ था नहीं। वे वेश्याएँ लगती भी नहीं थीं। उनके उठने-बैठने और बात

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एक तवाइफ़ का ख़त

मुझे उम्मीद है कि इससे पहले आपको किसी तवाइफ़ का ख़त न मिला होगा। ये भी उम्मीद करती हूँ कि कि आज तक आपने मेरी और इस क़ुमाश की दूसरी औरतों की

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डॉक्टर के शब्द

डॉ. रमन के पास मरीज बीमारी के आखिरी दिनों में ही आते थे। वे अक्सर चिल्लाते, ‘तुम एक दिन पहले क्यों नहीं आ सकते थे?’ इसका कारण भी साफ था – डॉक्टर

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पहेली

रामदयाल पूरा बहुरूपिया था। भेस और आवाज बदलने में उसे कमाल हासिल था। कॉलेज मे पढ़ता था तो वहाँ उसके अभिनय की धूम मची रहती थी; अब सिनेमा की दुनिया में आ

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इश्क़ की मस्ती

हैं आशिक़ और माशूक जहाँ वां शाह बज़ीरी है बाबा । नै रोना है नै धोना है नै दर्द असीरी है बाबा ।। दिन-रात बहारें चुहलें हैं और इश्क़ सग़ीरी है बाबा

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पितृ हत्या

खिड़की के कांच पर हल्की खटखटाहट ― ― कौन? ― चौकीदार, साहिब। अन्दर से माँ ने झाँका ― ― क्या बात है चौकीदार, आज इतनी जल्दी? ― खिड़की-दरवाजे बंद कर लीजिए। मेहमानों

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नया गणित

चुनाव से चंद महीने पहले मंत्री महोदय अपने चुनाव क्षेत्र में इस तरह आये जैसे मस्त और घबराया भैंसा लगातार खेदे जाने के बाद बाड़े में घुसता है, यानी बाड़े में तूफान

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देवधर की स्मृतियाँ

डॉक्टरों के आदेशानुसार दवा के बदलाव के लिए देवधर को जाना पड़ा। चलते वक्त कविगुरु की एक कविता बार-बार स्मरण होने लगी – “औषुधे डाक्टरे व्याधिर चेये आधि हल बड़ करले जखन

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