हो काल गति से परे चिरंतन, अभी यहाँ थे अभी यही हो। कभी धरा पर कभी गगन में, कभी कहाँ थे कभी कहीं हो। तुम्हारी राधा को भान है तुम, सकल चराचर
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी जोगी शिरीष तले मुझे मिला सिर्फ एक बाँसुरी थी उसके हाथ में आँखों में आकाश का सपना पैरों में धूल और घाव गाँव-गाँव वन-वन भटकता है
Moreसूरज ! सोख न लेना पानी ! तड़प तड़प कर मर जाएगी मन की मीन सयानी ! सूरज, सोख न लेना पानी ! बहती नदिया सारा जीवन साँसें जल की धारा जिस पर तैर रहा नावों-सा
Moreबुरी औरत के सपनों में नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर बुरी औरत के सपनों में नहीं होती बदन को धरती बनाकर धान कुटवाने वाली निर्जीव
Moreमैं तुम्हें ढूँढने स्वर्ग के द्वार तक रोज़ जाता रहा, रोज़ आता रहा तुम ग़ज़ल बन गयी, गीत में ढल गयी मंच से मैं तुम्हें गुनगुनाता रहा … ज़िन्दगी के सभी रास्ते
Moreजिसे भी प्यार करता हूँ महसूस करता हूँ कि मुझसे बड़ा हो गया है वह और पाता हूँ कि मैं दुनिया का सबसे छोटा आदमी हूँ।
Moreबहुत असंभव-से आविष्कार किए प्रेम ने और अंततः हमें मनुष्य बनाया लेकिन अस्वीकार की गहरी पीड़ा उस प्रेम के हर उपकार का ध्वंस करने पर तुली दिया जिसने सब कुछ न्यौछावर कर
Moreकेवल दो गीत लिखे मैंने इक गीत तुम्हारे मिलने का इक गीत तुम्हारे खोने का सड़कों-सड़कों, शहरों-शहरों नदियों-नदियों, लहरों-लहरों विश्वास किये जो टूट गए कितने ही साथी छूट गए पर्वत रोये-सागर रोये
Moreमेरे हाथ में एक कलम है जिसे मैं अक्सर ताने रहता हूँ हथगोले की तरह फेंक दूँ उसे बहस के बीच और धुँआ छँटने पर लड़ाई में कूद पड़ूँ – कोई है
Moreमूँद लो आँखें शाम के मानिंद ज़िन्दगी की चार तरफ़ें मिट गई हैं बंद कर दो साज़ के पर्दे चाँद क्यों निकला, उभरकर…? घरों में चूल्हे पड़े हैं ठंडे क्यों उठा यह
More