तेरे आने की जब ख़बर महके

तेरे आने की जब ख़बर महके तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके शाम महके तेरे तसव्वुर से शाम के बाद फिर सहर महके रात भर सोचता रहा तुझको ज़हन-ओ-दिल मेरे रात भर

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तुमसे अलग हो कर

तुमसे अलग होकर लगता है अचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं, और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में गिरता जा रहा हूँ। अब कहीं कोई यात्रा नहीं है, न अर्थमय, न

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मैं उनका ही होता

मैं उनका ही होता जिनसे मैंने रूप भाव पाए हैं। वे मेरे ही हिये बंधे हैं जो मर्यादाएँ लाए हैं। मेरे शब्द, भाव उनके हैं मेरे पैर और पथ मेरा, मेरा अंत

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कुछ बातें

आत्मग्लानि का कोई रंग नहीं होता बेचैनी की कोई भाषा नहीं दुख किसी कैलेंडर में दर्ज नहीं होते सुख को सहेजना धूप में स्वेटर सुखाना है मर्यादा की कोई सीमा नहीं होती

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काव्य गुरु

वे कहते हैं : प्रेम-कविताएँ लिखने के लिए प्रेम-कविताएँ पढ़ो वे यह नहीं कहते : प्रेम करो वे कहते हैं : फूलों तक जाने के लिए ख़ुशबू और रंग ख़रीदो वे यह

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मुझे हल कीजिए

मैं एक समस्या हूँ मुझे हल कीजिए उड़ने की चाह हूँ भटक गई राह हूँ निकल गई आह हूँ हिम्मत की थाह हूँ दुखती हुई रग हूँ थका हुआ पग हूँ ठहर

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इंतज़ार

एक औरत ताउम्र बाट जोहती है कि उसे किसी नाम से पुकारा जाए ऐसे कि नाम के आगे पीछे उग आएँ कई सारे नाम और वह अपना एक नाम भूल जाए। एक

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उस स्त्री का प्रेम

वह स्त्री पता नहीं कहाँ होगी जिसने मुझसे कहा था — वे तमाम स्त्रियाँ जो कभी तुम्हें प्यार करेंगी मेरे भीतर से निकल कर आई होंगी और तुम जो प्रेम मुझसे करोगे

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