नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ मुझे ऊँचाइयों का वह अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा
तेरे आने की जब ख़बर महके तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके शाम महके तेरे तसव्वुर से शाम के बाद फिर सहर महके रात भर सोचता रहा तुझको ज़हन-ओ-दिल मेरे रात भर
Moreतुमसे अलग होकर लगता है अचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं, और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में गिरता जा रहा हूँ। अब कहीं कोई यात्रा नहीं है, न अर्थमय, न
Moreमैं उनका ही होता जिनसे मैंने रूप भाव पाए हैं। वे मेरे ही हिये बंधे हैं जो मर्यादाएँ लाए हैं। मेरे शब्द, भाव उनके हैं मेरे पैर और पथ मेरा, मेरा अंत
Moreवे कहते हैं : प्रेम-कविताएँ लिखने के लिए प्रेम-कविताएँ पढ़ो वे यह नहीं कहते : प्रेम करो वे कहते हैं : फूलों तक जाने के लिए ख़ुशबू और रंग ख़रीदो वे यह
Moreमैं एक समस्या हूँ मुझे हल कीजिए उड़ने की चाह हूँ भटक गई राह हूँ निकल गई आह हूँ हिम्मत की थाह हूँ दुखती हुई रग हूँ थका हुआ पग हूँ ठहर
Moreजो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है जो रवि के रथ का घोड़ा है वह
Moreवह स्त्री पता नहीं कहाँ होगी जिसने मुझसे कहा था — वे तमाम स्त्रियाँ जो कभी तुम्हें प्यार करेंगी मेरे भीतर से निकल कर आई होंगी और तुम जो प्रेम मुझसे करोगे
Moreकू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की उस ने ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई
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