आँकड़ों की बीमारी

एक बार मुझे आँकड़ों की उल्टियाँ होने लगीं गिनते गिनते जब संख्या करोड़ों को पार करने लगी मैं बेहोश हो गया होश आया तो मैं अस्पताल में था खून चढ़ाया जा रहा

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राजनीतिज्ञ

विचलन तो दूर की बात है डर की एक लौ भी नहीं छूती उन्हें उन्होंने पढ़ रखी है गीता वे मार सकते हैं स्वजनों को वे जानते हैं तुम्हें कि तुम लाचार

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एक तुम्हारा होना

एक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है, बेज़ुबान छत दीवारों को घर कर देता है। ख़ाली शब्दों में आता है ऐसे अर्थ पिरोना गीत बन गया-सा लगता है घर का कोना-कोना

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अंतिम ऊँचाई

कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं, हमारे चारों ओर नहीं। कितना आसान होता चलते चले जाना यदि केवल हम चलते होते बाक़ी सब रुका

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पानी

आदमी तो आदमी मैं तो पानी के बारे में भी सोचता था कि पानी को भारत में बसना सिखाऊँगा सोचता था पानी होगा आसान पूरब जैसा पुआल के टोप जैसा मोम की

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टूटती धार

काँपती है बहुत पतली धार पानी की हवा में— कि जैसे भीड़ में खोई हुई बच्ची पिता को टेरती हो कि जैसे अनगिनत संभावनाएँ चाहकर भी फलवती होने न पाएँ टूटती है

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सुनो चारुशीला

दिवंगत पत्नी विजय के लिए  तुम अपनी दो आँखों से देखती हो एक दृश्य दो हाथों से करती हो एक काम दो पाँवों से दो रास्तों पर नहीं एक ही पर चलती

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लाजवंती

‘हथ लायाँ कुमलान नी लाजवन्ती दे बूटे।’ (ए सखि ये लाजवंती के पौधे हैं, हाथ लगाते ही कुम्हला जाते हैं.) (पंजाबी गीत) बटवारा हुआ और बेशुमार ज़ख़्मी लोगों ने उठ कर अपने

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एक बार फिर शुरू करना होगा

एक बार फिर शुरू करना होगा एक बार फिर ज़मीन जोतनी होगी बीजों का, खाद का चुनाव करना होगा एक बार फिर पत्थरों को काट कर नहर लानी होगी धूप-झुलसी धरती तक

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आँसू बाँधे हैं मैंने

आँसू बाँधे मैंने गठरिया में … अपने भी हैं और पराए भी हैं ये उपराए हैं तो तराए भी हैं ये आप आ गये हैं बराए भी हैं ये साधे हैं मैंने

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