नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ मुझे ऊँचाइयों का वह अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा
एक बार मुझे आँकड़ों की उल्टियाँ होने लगीं गिनते गिनते जब संख्या करोड़ों को पार करने लगी मैं बेहोश हो गया होश आया तो मैं अस्पताल में था खून चढ़ाया जा रहा
Moreविचलन तो दूर की बात है डर की एक लौ भी नहीं छूती उन्हें उन्होंने पढ़ रखी है गीता वे मार सकते हैं स्वजनों को वे जानते हैं तुम्हें कि तुम लाचार
Moreएक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है, बेज़ुबान छत दीवारों को घर कर देता है। ख़ाली शब्दों में आता है ऐसे अर्थ पिरोना गीत बन गया-सा लगता है घर का कोना-कोना
Moreकितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं, हमारे चारों ओर नहीं। कितना आसान होता चलते चले जाना यदि केवल हम चलते होते बाक़ी सब रुका
Moreदिवंगत पत्नी विजय के लिए तुम अपनी दो आँखों से देखती हो एक दृश्य दो हाथों से करती हो एक काम दो पाँवों से दो रास्तों पर नहीं एक ही पर चलती
Moreएक बार फिर शुरू करना होगा एक बार फिर ज़मीन जोतनी होगी बीजों का, खाद का चुनाव करना होगा एक बार फिर पत्थरों को काट कर नहर लानी होगी धूप-झुलसी धरती तक
Moreआँसू बाँधे मैंने गठरिया में … अपने भी हैं और पराए भी हैं ये उपराए हैं तो तराए भी हैं ये आप आ गये हैं बराए भी हैं ये साधे हैं मैंने
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