नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ मुझे ऊँचाइयों का वह अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा
मैंने हारने के लिए यह लड़ाई शुरू नहीं की थी इन अभाव के दिनों में भी जितना खुश हुआ उतना पहले कभी नहीं कि इधर कर्ज़ में जीने की आदत मैंने कई
Moreमेरे बाद वे उन छातियों से भी लगकर रोई होंगी जो मेरी नहीं थीं दूसरे चुंबन भी जगे होंगे उनके होंठों पर दूसरे हाथों ने भी जगाया होगा उनकी हथेलियों को उनकी
Moreप्रेम का आविष्कार करती औरतों ने ही कहा होगा फूल को फूल और चांद को चांद हवा में महसूस की होगी बेली के फूल की महक उन औरतों ने ही पहाड़ को
Moreमाँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी जोगी शिरीष तले मुझे मिला सिर्फ एक बाँसुरी थी उसके हाथ में आँखों में आकाश का सपना पैरों में धूल और घाव गाँव-गाँव वन-वन भटकता है
Moreसूरज ! सोख न लेना पानी ! तड़प तड़प कर मर जाएगी मन की मीन सयानी ! सूरज, सोख न लेना पानी ! बहती नदिया सारा जीवन साँसें जल की धारा जिस पर तैर रहा नावों-सा
Moreबुरी औरत के सपनों में नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर बुरी औरत के सपनों में नहीं होती बदन को धरती बनाकर धान कुटवाने वाली निर्जीव
Moreफ़ारिहा क्या बहुत ज़रूरी है हर किसी शेरसाज़ को पढ़ना क्या मेरी शायरी में कम है गुदाज़ क्या किसी दिलगुदाज़ को पढ़ना यानी मेरे सिवा भी और किसी शायरे दिलनवाज़ को पढ़ना
Moreमेरे हाथ में एक कलम है जिसे मैं अक्सर ताने रहता हूँ हथगोले की तरह फेंक दूँ उसे बहस के बीच और धुँआ छँटने पर लड़ाई में कूद पड़ूँ – कोई है
Moreमूँद लो आँखें शाम के मानिंद ज़िन्दगी की चार तरफ़ें मिट गई हैं बंद कर दो साज़ के पर्दे चाँद क्यों निकला, उभरकर…? घरों में चूल्हे पड़े हैं ठंडे क्यों उठा यह
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