मैंने हारने के लिए

मैंने हारने के लिए यह लड़ाई शुरू नहीं की थी इन अभाव के दिनों में भी जितना खुश हुआ उतना पहले कभी नहीं कि इधर कर्ज़ में जीने की आदत मैंने कई

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तुम आयी

तुम आयी जैसे छीमियों में धीरे- धीरे आता है रस जैसे चलते – चलते एड़ी में काँटा जाए धँस तुम दिखीं जैसे कोई बच्चा सुन रहा हो कहानी तुम हँसी जैसे तट

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पूर्व प्रेमिकाएँ

मेरे बाद वे उन छातियों से भी लगकर रोई होंगी जो मेरी नहीं थीं दूसरे चुंबन भी जगे होंगे उनके होंठों पर दूसरे हाथों ने भी जगाया होगा उनकी हथेलियों को उनकी

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सोख न लेना पानी

सूरज ! सोख न लेना पानी ! तड़प तड़प कर मर जाएगी मन की मीन सयानी ! सूरज, सोख न लेना पानी ! बहती नदिया सारा जीवन साँसें जल की धारा जिस पर तैर रहा नावों-सा

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बुरी औरत के सपनों में

बुरी औरत के सपनों में नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर बुरी औरत के सपनों में नहीं होती बदन को धरती बनाकर धान कुटवाने वाली निर्जीव

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मेरे ग़ुस्से के बाद भी

फ़ारिहा क्या बहुत ज़रूरी है हर किसी शेरसाज़ को पढ़ना क्या मेरी शायरी में कम है गुदाज़ क्या किसी दिलगुदाज़ को पढ़ना यानी मेरे सिवा भी और किसी शायरे दिलनवाज़ को पढ़ना

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चीख से उतर कर

मेरे हाथ में एक कलम है जिसे मैं अक्सर ताने रहता हूँ हथगोले की तरह फेंक दूँ उसे बहस के बीच और धुँआ छँटने पर लड़ाई में कूद पड़ूँ – कोई है

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मूँद लो आँखें

मूँद लो आँखें शाम के मानिंद ज़िन्दगी की चार तरफ़ें मिट गई हैं बंद कर दो साज़ के पर्दे चाँद क्यों निकला, उभरकर…? घरों में चूल्हे पड़े हैं ठंडे क्यों उठा यह

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