माँ का दुःख

कितना प्रामाणिक था उसका दुःख लड़की को दान में देते वक्त जैसे वही उसकी अंतिम पूँजी हो लड़की अभी सयानी नहीं थी अभी इतनी भोली सरल थी कि उसे सुख का आभास

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ऐसा क्यूँ होता है

कई दिनों बाद पति-पत्नी जब घर लौटे तो बग़ीचे के फूल किसी ने तोड़ लिए थे पति बेहद नाराज़ हुआ घर में घुसते ही सामान इधर-उधर फेंकने लगा चीख़-चीख़ कर गालियाँ देने

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कजरी के गीत मिथ्या हैं

अगले कातिक में मैं बारह साल की हो जाती ऐसा माँ कहती थी लेकिन जेठ में ही मेरा ब्याह करा दिया गया ब्याह शब्द से डर लगता था जब से पड़ोस की

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