फूलों ने दिए जख़्म तो काँटों से गिला क्या क्या करना था अपनों से सुलूक और किया क्या जब हाथ में शीशा था न सागर था न मीना गर दिल नहीं टूटा
फूलों ने दिए जख़्म तो काँटों से गिला क्या क्या करना था अपनों से सुलूक और किया क्या जब हाथ में शीशा था न सागर था न मीना गर दिल नहीं टूटा
महीनों बाद दफ़्तर आ रहे हैं हम एक सदमे से बाहर आ रहे हैं तेरी बाहों से दिल उकता गया हैं अब इस झूले में चक्कर आ रहे हैं कहाँ सोया है चौकीदार मेरा ये कैसे लोग अंदर आ रहे