रामदयाल पूरा बहुरूपिया था। भेस और आवाज बदलने में उसे कमाल हासिल था। कॉलेज मे पढ़ता था तो वहाँ उसके अभिनय की धूम मची रहती थी; अब सिनेमा की दुनिया में आ
Moreहैं आशिक़ और माशूक जहाँ वां शाह बज़ीरी है बाबा । नै रोना है नै धोना है नै दर्द असीरी है बाबा ।। दिन-रात बहारें चुहलें हैं और इश्क़ सग़ीरी है बाबा
Moreहो काल गति से परे चिरंतन, अभी यहाँ थे अभी यही हो। कभी धरा पर कभी गगन में, कभी कहाँ थे कभी कहीं हो। तुम्हारी राधा को भान है तुम, सकल चराचर
Moreखिड़की के कांच पर हल्की खटखटाहट ― ― कौन? ― चौकीदार, साहिब। अन्दर से माँ ने झाँका ― ― क्या बात है चौकीदार, आज इतनी जल्दी? ― खिड़की-दरवाजे बंद कर लीजिए। मेहमानों
Moreडॉक्टरों के आदेशानुसार दवा के बदलाव के लिए देवधर को जाना पड़ा। चलते वक्त कविगुरु की एक कविता बार-बार स्मरण होने लगी – “औषुधे डाक्टरे व्याधिर चेये आधि हल बड़ करले जखन
Moreलोग मुझे कवि कहते हैं, और गलती करते हैं; मैं अपने को कवि समझता था और गलती करता था। मुझे अपनी गलती मालूम हुई मियाँ राहत से मिलकर, और लोगों को उनकी
Moreमुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद अपने ख़्वाबों के जज़ीरों
More“सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं ख़त ग़ैर का पढ़ते थे जो टोका तो वो बोले अख़बार का पर्चा है ख़बर
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