ये आए दिन के हंगामे ये जब देखो सफ़र करना यहाँ जाना वहाँ जाना इसे मिलना उसे मिलना हमारे सारे लम्हे ऐसे लगते हैं कि जैसे ट्रेन के चलने से पहले रेलवे-स्टेशन
Moreमैं उन्हें समझा रहा था कि लड़की की शादी में टीमटाम में व्यर्थ खर्च मत करो। पर वे बुजुर्ग कह रहे थे – आप ठीक कहते हैं, मगर रिश्तेदारों में नाक कट
Moreकमरे की नीम-तारीक फ़िज़ा में ऐसा महसूस हुआ जैसे एक मौहूम साया आहिस्ता-आहिस्ता दबे-पाँव छम्मन मियाँ की मसहरी की तरफ़ बढ़ रहा है। साये का रुख़ छम्मन मियाँ की मसहरी की तरफ़
Moreमैं वह ऊँचा नहीं जो मात्र ऊँचाई पर होता है कवि हूँ और पतन के अंतिम बिंदु तक पीछा करता हूँ हर ऊँचाई पर दबी दिखती है मुझे ऊँचाई की पूँछ लगता
Moreउँगलियों पर गिन रही है दिन खाँटी घरेलू औरत सोनू और मुनिया पूछते हैं ‘क्या मिलाती रहती हो मां उँगलियों की पोरों पर’ वह कहती है ‘तुम्हारे मामा की शादी का दिन
Moreपत्थर और चूना बहुत था, लेकिन अगर थोड़ी-सी जगह पर दीवार की तरह उभरकर खड़ा हो जाता, तो घर की दीवारें बन सकता था। पर बना नहीं। वह धरती पर फैल गया,
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