कविता और लाठी

तुम मुझसे हाले-दिल न पूछो ऐ दोस्त! तुम मुझसे सीधे-सीधे तबियत की बात कहो। और तबियत तो इस समय ये कह रही है कि मौत के मुँह में लाठी ढकेल दूँ, या

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बे-क़रारी सी बे-क़रारी है

बे-क़रारी सी बे-क़रारी है वस्ल है और फ़िराक़ तारी है जो गुज़ारी न जा सकी हम से हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है निघरे क्या हुए कि लोगों पर अपना साया भी

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जम्हूरियत

दस करोड़ इंसानो! ज़िंदगी से बेगानो! सिर्फ़ चंद लोगों ने हक़ तुम्हारा छीना है ख़ाक ऐसे जीने पर ये भी कोई जीना है बे-शुऊर भी तुम को बे-शुऊर कहते हैं सोचता हूँ

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हँसती रहने देना

जब आवे दिन तब देह बुझे या टूटे इन आँखों को हँसती रहने देना ! हाथों ने बहुत अनर्थ किये पग ठौर-कुठौर चले मन के आगे भी खोटे लक्ष्य रहे वाणी ने

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सतपुड़ा के घने जंगल

सतपुड़ा के घने जंगल। नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। झाड ऊँचे और नीचे, चुप खड़े हैं आँख मीचे, घास चुप है, कास चुप है मूक शाल, पलाश चुप है।

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उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!

बाबा! मुझे उतनी दूर मत ब्याहना जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हें मत ब्याहना उस देश में जहाँ आदमी से ज़्यादा ईश्वर बसते हों जंगल नदी पहाड़

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पिता की तस्वीर

पिता की छोटी-छोटी बहुत-सी तस्वीरें पूरे घर में बिखरी हैं उनकी आँखों में कोई पारदर्शी चीज़ साफ़ चमकती है वह अच्छाई है या साहस तस्वीर में पिता खाँसते नहीं व्याकुल नहीं होते

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मारे जाएँगे

जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएँगे कठघरे में खड़े कर दिये जाएँगे जो विरोध में बोलेंगे जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज

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तुझसे तो कोई गिला नहीं है

तुझसे तो कोई गिला नहीं है क़िस्मत में मेरी सिला नहीं है बिछड़े तो न जाने हाल क्या हो जो शख़्स अभी मिला नहीं है जीने की तो आरज़ू ही कब थी

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