मीर

मीर पर बातें करो तो वे बातें भी उतनी ही अच्छी लगती हैं जितने मीर और तुम्हारा वह कहना सब दीवानगी की सादगी में दिल-दिल करना दुहराना दिल के बारे में ज़ोर

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बड़ी हो रही है लड़की

जब वह कुछ कहती है उसकी आवाज़ में एक कोई चीज़ मुझे एकाएक औरत की आवाज़ लगती है जो अपमान बड़े होने पर सहेगी वह बड़ी होगी डरी और दुबली रहेगी और

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एक नया अनुभव

मैनें चिड़िया से कहा, मैं तुम पर एक कविता लिखना चाहता हूँ। चिड़िया नें मुझ से पूछा, ‘तुम्हारे शब्दों में मेरे परों की रंगीनी है?’ मैंने कहा, ‘नहीं’। ‘तुम्हारे शब्दों में मेरे

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अजीब आदमी था वो

अजीब आदमी था वो मोहब्बतों का गीत था बग़ावतों का राग था कभी वो सिर्फ़ फूल था कभी वो सिर्फ़ आग था अजीब आदमी था वो वो मुफ़लिसों से कहता था कि

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क्या कहती हो

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उस शाम के मुहाने पे उस शब के सिरहाने से वादियों के ख़ामोशी में पेड़ों के सरसराहट से सरकती हुई तुम्हारी मुस्कुराहट बोलों के बीच तुम्हारी मीठी सी सांस की आवाज़ जावेदां

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आदमी नामा

दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमी और मुफ़्लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमी ज़रदार-ए-बे-नवा है सो है वो भी आदमी नेमत जो खा रहा है सो है वो

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निरापद कोई नहीं है

ना निरापद कोई नहीं है न तुम, न मैं, न वे न वे, न मैं, न तुम सबके पीछे बंधी है दुम आसक्ति की! आसक्ति के आनन्द का छंद ऐसा ही है

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उस औरत की बगल में लेटकर

मैंने पहली बार महसूस किया है कि नंगापन अन्धा होने के खिलाफ़ एक सख्त कार्यवाही है उस औरत की बगल में लेटकर मुझे लगा कि नफ़रत और मोमबत्तियाँ जहाँ बेकार साबित हो

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ख़ून फिर ख़ून है

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा ख़ाक-ए-सहरा पे जमे या कफ़-ए-क़ातिल पे जमे फ़र्क़-ए-इंसाफ़ पे या पा-ए-सलासिल पे जमे तेग़-ए-बे-दाद

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