हो काल गति से परे चिरंतन

हो काल गति से परे चिरंतन, अभी यहाँ थे अभी यही हो। कभी धरा पर कभी गगन में, कभी कहाँ थे कभी कहीं हो। तुम्हारी राधा को भान है तुम, सकल चराचर

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शुन्यता

जब बिखरी हुई यादें पड़ी होती हैं काली रौशनी के मानिंद तो ग़ैर-जरूरी चीजें साथ देती हैं मसलन खुली सड़क को ताकना ठंडी चाय की छाली हटा कर पीना और फिर सब

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ग़ुलामी की अंतिम हदों तक लड़ेंगे

इस ज़माने में जिनका ज़माना है भाई उन्हीं के ज़माने में रहते हैं हम उन्हीं की हैं सहते, उन्हीं की हैं कहते उन्हीं की ख़ातिर दिन-रात बहते हैं हम ये उन्हीं का

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लयबद्ध

सबको तो रोशनी नहीं मिलती समझौता कर लो अँधियारे से हर भटके राही को सिर्फ़ यही उत्तर एक मिला ध्रुवतारे से। ज़्यादातर सुंदर ही होते हैं फूलों के बारे में यह सच

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लौटना

तुमने कहा जाती हूँ और तुमने सोचा कि कवि-केदार की तरह मैं कहूँगा जाओ लेकिन मेरी लोक-भाषा के पास अपने बिंब थे मेरी भाषा में जब भी कोई जाता था तो ‘आता

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मातृभाषा की मौत

माँ के मुँह में ही मातृभाषा को क़ैद कर दिया गया और बच्चे उसकी रिहाई की माँग करते-करते बड़े हो गए। मातृभाषा ख़ुद नहीं मरी थी उसे मारा गया था पर, माँ

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चंदू, मैंने सपना देखा

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू चंदू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में

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किस अज्ञात इशारे पर

यह एक नया दिन है— ख़ून में नहाई सदियों के बाद—यह मौन अट्टहास। न्याय की आशा में बाँधे हुए तुम्हें—मैं ताक रहा हूँ बूँद-बूँद टूटते आकाश में अँधेरा चिड़ियों की आँखें निचोड़

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सच्चाई

मेहनत से मिलती है छिपाई जाती है स्वार्थ से फिर मेहनत से मिलती है।

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