मैं तुम्हें ढूँढने स्वर्ग के द्वार तक

मैं तुम्हें ढूँढने स्वर्ग के द्वार तक रोज़ जाता रहा, रोज़ आता रहा तुम ग़ज़ल बन गयी, गीत में ढल गयी मंच से मैं तुम्हें गुनगुनाता रहा … ज़िन्दगी के सभी रास्ते

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सबसे छोटा आदमी

जिसे भी प्यार करता हूँ महसूस करता हूँ कि मुझसे बड़ा हो गया है वह और पाता हूँ कि मैं दुनिया का सबसे छोटा आदमी हूँ।

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प्रेम की अनिवार्यता

बहुत असंभव-से आविष्कार किए प्रेम ने और अंततः हमें मनुष्य बनाया लेकिन अस्वीकार की गहरी पीड़ा उस प्रेम के हर उपकार का ध्वंस करने पर तुली दिया जिसने सब कुछ न्यौछावर कर

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केवल दो गीत लिखे मैंने

केवल दो गीत लिखे मैंने इक गीत तुम्हारे मिलने का इक गीत तुम्हारे खोने का सड़कों-सड़कों, शहरों-शहरों नदियों-नदियों, लहरों-लहरों विश्वास किये जो टूट गए कितने ही साथी छूट गए पर्वत रोये-सागर रोये

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एक स्त्री पर कीजिए विश्वास

जब ढह रही हों आस्थाएँ जब भटक रहे हों रास्ता तो इस संसार में एक स्त्री पर कीजिए विश्वास वह बताएगी सबसे छिपाकर रखा गया अनुभव अपने अँधेरों में से निकालकर देगी

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चीख से उतर कर

मेरे हाथ में एक कलम है जिसे मैं अक्सर ताने रहता हूँ हथगोले की तरह फेंक दूँ उसे बहस के बीच और धुँआ छँटने पर लड़ाई में कूद पड़ूँ – कोई है

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मूँद लो आँखें

मूँद लो आँखें शाम के मानिंद ज़िन्दगी की चार तरफ़ें मिट गई हैं बंद कर दो साज़ के पर्दे चाँद क्यों निकला, उभरकर…? घरों में चूल्हे पड़े हैं ठंडे क्यों उठा यह

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कविताएँ : गुंजन उपाध्याय पाठक

1. वह कांसे की नर्तकी जो मोहनजोदड़ो के छिन्न-भिन्न हो चुके सभ्यता के बरसों बाद कहीं मिट्टी की अनंत परतों में अपने अंतर्मन की अनेकानेक यात्राएं समेटे मिली थी उसके हृदय में

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क्या तुम रोई हो?

तुम देख लेते हो उसे वहाँ से निकल कर आते हुए अपने भीतर जहाँ जाकर सिसकती है अक्सर तुम पूछते हो : क्या हुआ? वह कहती है : कुछ नहीं तुम फिर पूछते

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