मैंने पहली बार महसूस किया है कि नंगापन अन्धा होने के खिलाफ़ एक सख्त कार्यवाही है उस औरत की बगल में लेटकर मुझे लगा कि नफ़रत और मोमबत्तियाँ जहाँ बेकार साबित हो
मैं तुम्हें ढूँढने स्वर्ग के द्वार तक रोज़ जाता रहा, रोज़ आता रहा तुम ग़ज़ल बन गयी, गीत में ढल गयी मंच से मैं तुम्हें गुनगुनाता रहा … ज़िन्दगी के सभी रास्ते
Moreजिसे भी प्यार करता हूँ महसूस करता हूँ कि मुझसे बड़ा हो गया है वह और पाता हूँ कि मैं दुनिया का सबसे छोटा आदमी हूँ।
Moreबहुत असंभव-से आविष्कार किए प्रेम ने और अंततः हमें मनुष्य बनाया लेकिन अस्वीकार की गहरी पीड़ा उस प्रेम के हर उपकार का ध्वंस करने पर तुली दिया जिसने सब कुछ न्यौछावर कर
Moreकेवल दो गीत लिखे मैंने इक गीत तुम्हारे मिलने का इक गीत तुम्हारे खोने का सड़कों-सड़कों, शहरों-शहरों नदियों-नदियों, लहरों-लहरों विश्वास किये जो टूट गए कितने ही साथी छूट गए पर्वत रोये-सागर रोये
Moreजब ढह रही हों आस्थाएँ जब भटक रहे हों रास्ता तो इस संसार में एक स्त्री पर कीजिए विश्वास वह बताएगी सबसे छिपाकर रखा गया अनुभव अपने अँधेरों में से निकालकर देगी
Moreमेरे हाथ में एक कलम है जिसे मैं अक्सर ताने रहता हूँ हथगोले की तरह फेंक दूँ उसे बहस के बीच और धुँआ छँटने पर लड़ाई में कूद पड़ूँ – कोई है
Moreमूँद लो आँखें शाम के मानिंद ज़िन्दगी की चार तरफ़ें मिट गई हैं बंद कर दो साज़ के पर्दे चाँद क्यों निकला, उभरकर…? घरों में चूल्हे पड़े हैं ठंडे क्यों उठा यह
Moreअब देखिए न मेरी कारगुज़ारी कि मैं मँगनी के घोड़े पर सवारी कर ठाकुर साहब के लिए उन की रियाया से लगान और सेठ साहब के लिए पंसार-हट्टे की हर दूकान से
More1. वह कांसे की नर्तकी जो मोहनजोदड़ो के छिन्न-भिन्न हो चुके सभ्यता के बरसों बाद कहीं मिट्टी की अनंत परतों में अपने अंतर्मन की अनेकानेक यात्राएं समेटे मिली थी उसके हृदय में
Moreतुम देख लेते हो उसे वहाँ से निकल कर आते हुए अपने भीतर जहाँ जाकर सिसकती है अक्सर तुम पूछते हो : क्या हुआ? वह कहती है : कुछ नहीं तुम फिर पूछते
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