नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ मुझे ऊँचाइयों का वह अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा
मेरे ही लहू पर गुज़र-औक़ात करो हो मुझ से ही अमीरों की तरह बात करो हो दिन एक सितम एक सितम रात करो हो वो दोस्त हो दुश्मन को भी तुम मात
Moreज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा तू मिला है तो ये एहसास हुआ है मुझको ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिये
Moreविचलन तो दूर की बात है डर की एक लौ भी नहीं छूती उन्हें उन्होंने पढ़ रखी है गीता वे मार सकते हैं स्वजनों को वे जानते हैं तुम्हें कि तुम लाचार
Moreकुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया और कुछ तल्ख़ी-ए-हालात ने दिल तोड़ दिया हम तो समझे थे के बरसात में बरसेगी शराब आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया
Moreएक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है, बेज़ुबान छत दीवारों को घर कर देता है। ख़ाली शब्दों में आता है ऐसे अर्थ पिरोना गीत बन गया-सा लगता है घर का कोना-कोना
Moreकितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं, हमारे चारों ओर नहीं। कितना आसान होता चलते चले जाना यदि केवल हम चलते होते बाक़ी सब रुका
Moreदुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें आज तक अपनी बेकली का सबब ख़ुद भी जाना नहीं कि तुझ से कहें बे-तरह हाल-ए-दिल है
Moreदिवंगत पत्नी विजय के लिए तुम अपनी दो आँखों से देखती हो एक दृश्य दो हाथों से करती हो एक काम दो पाँवों से दो रास्तों पर नहीं एक ही पर चलती
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