नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ मुझे ऊँचाइयों का वह अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा
मैं उन्हें समझा रहा था कि लड़की की शादी में टीमटाम में व्यर्थ खर्च मत करो। पर वे बुजुर्ग कह रहे थे – आप ठीक कहते हैं, मगर रिश्तेदारों में नाक कट
Moreकमरे की नीम-तारीक फ़िज़ा में ऐसा महसूस हुआ जैसे एक मौहूम साया आहिस्ता-आहिस्ता दबे-पाँव छम्मन मियाँ की मसहरी की तरफ़ बढ़ रहा है। साये का रुख़ छम्मन मियाँ की मसहरी की तरफ़
Moreउँगलियों पर गिन रही है दिन खाँटी घरेलू औरत सोनू और मुनिया पूछते हैं ‘क्या मिलाती रहती हो मां उँगलियों की पोरों पर’ वह कहती है ‘तुम्हारे मामा की शादी का दिन
Moreपत्थर और चूना बहुत था, लेकिन अगर थोड़ी-सी जगह पर दीवार की तरह उभरकर खड़ा हो जाता, तो घर की दीवारें बन सकता था। पर बना नहीं। वह धरती पर फैल गया,
Moreचाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा बुझ गई आस छुप गया तारा थरथराता रहा धुआँ तन्हा ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तन्हा है और जाँ
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