शबाना

ये आए दिन के हंगामे ये जब देखो सफ़र करना यहाँ जाना वहाँ जाना इसे मिलना उसे मिलना हमारे सारे लम्हे ऐसे लगते हैं कि जैसे ट्रेन के चलने से पहले रेलवे-स्टेशन

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कभी कभी

कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है कि ज़िंदगी तिरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी ये तीरगी जो मिरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है

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पितृहत्या

खिड़की के कांच पर हल्की खटखटाहट― ―कौन? ―चौकीदार, साहिब। अन्दर से माँ ने झाँका― ―क्या बात है चौकीदार―आज इतनी जल्दी ―खिड़की-दरवाजे बंद कर लीजिए। मेहमानों को बाहर न निकलने दीजिए―शहर में बड़ा

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दो नाक वाले लोग

मैं उन्हें समझा रहा था कि लड़की की शादी में टीमटाम में व्यर्थ खर्च मत करो। पर वे बुजुर्ग कह रहे थे – आप ठीक कहते हैं, मगर रिश्तेदारों में नाक कट

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बदन की ख़ुशबू

कमरे की नीम-तारीक फ़िज़ा में ऐसा महसूस हुआ जैसे एक मौहूम साया आहिस्ता-आहिस्ता दबे-पाँव छम्मन मियाँ की मसहरी की तरफ़ बढ़ रहा है। साये का रुख़ छम्मन मियाँ की मसहरी की तरफ़

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परिणति

उस दिन भी ऐसी ही रात थी। ऐसी ही चांदनी थी। उस दिन भी ऐसे ही अकस्मात्, हम-तुम मिल गए थे। उस दिन भी इसी पार्क की इसी बेंच पर बैठ कर,

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उँगलियों के पोरों पर दिन गिनती

उँगलियों पर गिन रही है दिन खाँटी घरेलू औरत सोनू और मुनिया पूछते हैं ‘क्या मिलाती रहती हो मां उँगलियों की पोरों पर’ वह कहती है ‘तुम्हारे मामा की शादी का दिन

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यह कहानी नहीं

पत्थर और चूना बहुत था, लेकिन अगर थोड़ी-सी जगह पर दीवार की तरह उभरकर खड़ा हो जाता, तो घर की दीवारें बन सकता था। पर बना नहीं। वह धरती पर फैल गया,

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उड़ानें

कवि मरते हैं जैसे पक्षी मरते हैं गोधूलि में ओझल होते हुए ! सिर्फ़ उड़ानें बची रह जाती हैं दुनिया में आते ही क्यों हैं जहाँ इन्तज़ार बहुत और साथ कम स्त्रियाँ जब

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चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा बुझ गई आस छुप गया तारा थरथराता रहा धुआँ तन्हा ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तन्हा है और जाँ

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