इश्क़ का रोग

इश्क़ का रोग तो विर्से में मिला था मुझको दिल धड़कता हुआ सीने में मिला था मुझ को। हाँ ये काफ़िर उसी हुजरे में मिला था मुझको एक मोमिन जहाँ सज्दे में

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घर

जहाँ बिल्ली को खदेड़ता दिख जाएगा खरगोश वहीं अपना घर बनाऊँगा वहीं शीत वसंत लाऊँगा वहीं लगाऊँगा सेब, नारंगी संतरा वहीं कामधेनु पोसूँगा वहीं कवियों, बुलाऊँगा तुम्हें और काव्य पाठ कराऊँगा जहाँ

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पिता का चश्मा

बुढ़ापे के समय पिता के चश्मे एक-एक कर बेकार होते गए आँख के कई डॉक्टरों को दिखाया विशेषज्ञों के पास गए अन्त में सबने कहा — आपकी आँखों का अब कोई इलाज

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घर में ठंडे चूल्हे पर

घर में ठन्डे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है बगावत के कमल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में मैं जब भी देखता

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तीसरा रास्ता

मगध में शोर है कि मगध में शासक नहीं रहे जो थे वे मदिरा, प्रमाद और आलस्य के कारण इस लायक नहीं रहे कि उन्हें हम मगध का शासक कह सकें लगभग

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ढाका से वापसी पर

हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुदारातों के बाद फिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बाद कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद थे

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कुंठा

मेरी कुंठा रेशम के कीड़ों-सी ताने-बाने बुनती, तड़प तड़पकर बाहर आने को सिर धुनती, स्वर से शब्दों से भावों से औ’ वीणा से कहती-सुनती, गर्भवती है मेरी कुंठा – कुँवारी कुंती! बाहर

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तुम्हारा भगवान

तुम्हारे मान लेने से पत्थर भगवान हो जाता है, लेकिन तुम्हारे मान लेने से पत्थर पैसा नहीं हो जाता। तुम्हारा भगवान पत्ते की गाय है, जिससे तुम खेल तो सकते हो, लेकिन

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उत्तर

बहुत अधिक, बहुत अधिक तुम्‍हें याद करता मैं रहा; यह भी था कारण जो पत्र मैं लिख नहीं सका; लिख नहीं सका, बस। भावों का भार उन शब्‍दों से उठ नहीं सका,

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एक टूटता हुआ घर

एक टूटते हुए घर की चीखें दूर-दूर तक सुनी जाती हैं कान दिए लोग सुनते हैं चेहरे पर कोफ्त लपेटे नींद की गोलियाँ निगलने पर भी वह टूटता हुआ घर सारी-सारी रात

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