लौटना

तुमने कहा जाती हूँ और तुमने सोचा कि कवि-केदार की तरह मैं कहूँगा जाओ लेकिन मेरी लोक-भाषा के पास अपने बिंब थे मेरी भाषा में जब भी कोई जाता था तो ‘आता

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चंदू, मैंने सपना देखा

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू चंदू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में

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उत्सव

देखो हत्यारों को मिलता राजपाट सम्मान जिनके मुँह में कौर मांस का उनको मगही पान प्राइवेट बंदूक़ों में अब है सरकारी गोली गली-गली फगुआ गाती है हत्यारों की टोली देखो घेरा बाँध

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एक थी गौरा

लंबे कद और डबलंग चेहरे वाले चाचा रामशरण के लाख विरोध के बावजूद आशू का विवाह वहीं हुआ। उन्होंने तो बहुत पहले ही ऐलान कर दिया था कि ‘लड़की बड़ी बेहया है।’

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अनुभव

1970 की गर्मियों का प्रारंभ था। गंगा के मैदान में गर्मियों के बारे में सभी जानते हैं। यहाँ पर मौसम का विशेष कुछ तात्‍पर्य नहीं है सिवाय इसके कि एक लंबे अंतराल

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अपरिचित

कोहरे की वजह से खिड़कियों के शीशे धुँधले पड़ गये थे। गाड़ी चालीस की रफ़्तार से सुनसान अँधेरे को चीरती चली जा रही थी। खिड़की से सिर सटाकर भी बाहर कुछ दिखाई

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वे तुम्हें मज़बूर करेंगे

वे तुम्हें मज़बूर करेंगे कि तुम्हारा भी एक रूप हो निश्चित कि तुम्हारा भी हो एक दावा कि हो तुम्हारा भी एक वादा कि तुम्हारा भी एक स्टैण्ड हो कि तुम्हारी भी

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वसीयत

भला राख की ढेरी बनकर क्या होगा ? इससे तो अच्छा है कि जाने के पहले अपना सब कुछ दान कर जाऊँ। अपनी आँखें मैं अपनी स्पेशल के ड्राइवर को दे जाऊँगा। ताकि

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ये बातें झूठी बातें हैं

ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं? हैं लाखों रोग ज़माने में, क्यों इश्क़ है रुसवा बेचारा हैं

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मैं तुझे फिर मिलूँगी

मैं तुझे फिर मिलूँगी कहाँ कैसे पता नहीं शायद तेरे कल्पनाओं की प्रेरणा बन तेरे केनवास पर उतरुँगी या तेरे केनवास पर एक रहस्यमयी लकीर बन ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी मैं तुझे

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